परिचय


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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

अभिगृहीत...प्रमेय...उपप्रमेय...प्रमेयिका...???

गणित के उच्च-स्तरीय पाठ्य पुस्तकों को खोलते ही हमारा सामना कुछ विशिष्ट शब्दावलियों : अभिगृहीत (Axiom), प्रमेय (Theorem), उपप्रमेय (Corollary), प्रमेयिका (Lemma), प्रतिज्ञप्ति (Proposition), अनुमान (Conjecture), उपपत्ति (proof), परिभाषा (Definition),  इत्यादि से हमारा सामना होता है. यहाँ तक कि सातवीं - आठवीं कक्षा के छात्रों को भी ज्यामिति की पुस्तक में इन शब्दावलियों का सामना करना पड़ता है. यहाँ हम इन शब्दावलियों को परिभाषित करेंगे और इनके प्रयोगों के विषय में बताएँगे.

गणित में सामान्यतः किसी विषय या अध्याय का प्रारंभ कुछ परिभाषाओं से होता है. परिभाषा  से क्या तात्पर्य है? अर्थात किसी वस्तु को परिभाषित करने का क्या अर्थ है? क्या सभी वस्तुओं को परिभाषित किया जा सकता है ? आइए, पहले इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं. क्योंकि हम गणित में इन शब्दावलियों पर चर्चा कर रहे हैं, अतः "वस्तु" से हमारा तात्पर्य होगा: "गणितीय वस्तु". परन्तु ये परिभाषाएँ विज्ञान में भी  स्वीकार्य हैं.

परिभाषा : किसी गणितीय वस्तु की परिभाषा से तात्पर्य है: उस वस्तु को कुछ विशिष्ट गुणों और लक्षणों द्वारा एक निश्चित और स्पष्ट अर्थ प्रदान करना. हमें परिभाषा में उन्हीं गुणों और लक्षणों को व्यक्त करना होता है, जो सत्य हों. 
उदाहरण के लिए, ज्यामिति में त्रिभुज (triangle) की परिभाषा हम इस प्रकार देते हैं : तीन सरल रेखाखंडों (straight line segments) से बनी संवृत्त (closed) आकृति को त्रिभुज कहा जाता है. परन्तु त्रिभुज की परिभाषा हम इस प्रकार नहीं दे सकते हैं: तीन रेखाखंडों से बनी आकृति को त्रिभुज कहा जाता है.  ध्यान दीजिये कि परिभाषा में रेखाखंड के साथ "सरल" विशेषण प्रयुक्त करना आवश्यक है. उदाहरण के लिए, चित्र - 2 की आकृति त्रिभुज नहीं है, क्योंकि इसमें एक रेखाखंड वक्र रेखाखंड है. इसी प्रकार परिभाषा में संवृत्त विशेषण का प्रयोग आवश्यक है. चित्र - 3 की आकृति तीन सरल रेखाखंडों से तो बनी है, परन्तु संवृत्त नहीं होने के कारण इसे त्रिभुज नहीं माना जा सकता है.

इस प्रकार परिभाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसे पढ़कर प्रत्येक व्यक्ति को उस वस्तु का एक निश्चित अर्थ समझ में आ जाए. यदि अलग- अलग व्यक्तियों को अलग - अलग अर्थ प्रतीत हों, तो संभवतः परिभाषा सही नहीं हो सकती है.
सभी वस्तुओं को परिभाषित करना संभव नहीं है. उदाहरण के लिए, ज्यामिति में बिंदु (point), रेखा (line) और समतल (plane) को परिभाषित करना संभव नहीं है. इनकी केवल हम कल्पना कर सकते हैं और इसकी कुछ- कुछ व्याख्या कर सकते हैं. यह मानव की प्रकृति है कि अपरिभाषित होते हुए भी हम अन्य व्यक्तियों को इन वस्तुओं से परिचित करा सकते हैं और वे वही समझते हैं, जो हम समझाना चाहते हैं.

हम अभिगृहीत की परिभाषा से प्रारंभ करते हैं. नीचे दी गई परिभाषा पारंपरिक (classical) है. आधुनिक गणित में अभिगृहीत को अत्यधिक व्यापक रूप से परिभाषित किया जाता है, जिसे हम इस परिभाषा के बाद प्रस्तुत करेंगे.

अभिगृहीत (पारंपरिक परिभाषा): वैसा गणितीय कथन, जो अंतर्ज्ञान से सत्य प्रतीत होता है, परन्तु सत्य प्रमाणित करना संभव प्रतीत नहीं होता हो और जिसे बिना किसी प्रमाण (उपपत्ति) के सत्य मान लिया जाता है, अभिगृहीत कहलाता है.

इन अभिगृहीतों की सहायता से अन्य कथनों को प्रमाणित किया जाता है. इस प्रकार अभिगृहीत गणित में आधारस्तंभ हैं.उदाहरण के लिए ज्यामिति का एक अभिगृहीत है: दो अलग-अलग बिंदुओं से एक और केवल एक रेखा ही गुजर सकती है. अर्थात, दो अलग - अलग बिंदु एक रेखा को पूर्णतः निर्धारित करता है (चित्र - 4 देखें). इस कथन से सभी सहमत होंगे, परन्तु इसे प्रमाणित करना संभव नहीं है. प्रयास करके देखें !

आधुनिक गणित में अभिगृहीत से तात्पर्य होता है - वैसे कथन जिन्हें सत्य मानकर हम वहाँ से गणित के किसी विषय का प्रारंभ करते हैं और फिर उन कथनों के आधार पर अन्य परिणामों को सिद्ध करते हैं. क्योंकि गणित के उस विषय का प्रारंभ ही इन कथनों से होता है, अतः इन्हें आगे आने वाले परिणामों की सहायता से सिद्ध करने की अनुमति नहीं  होती है. इस प्रकार पूर्वोक्त परिभाषा की ही तरह यहाँ भी अभिगृहीत किसी गणितीय अवधारणा के विकास में आधारशिला की तरह कार्य करते हैं. किसी एक ही अवधारणा को अभिगृहीतों के कई तुल्य निकाय (systems) की सहायता से विकास किया जा सकता है. इस प्रकार यदि कोई कथन अभिगृहीतों के किसी निकाय में अभिगृहीत है, तो वह किसी अन्य निकाय में अभिगृहीत नहीं भी हो सकता है, बल्कि अन्य अभिगृहीतोंकी सहायता से सिद्ध किया हुआ परिणाम हो सकता है.

अभिगृहीत (आधुनिक परिभाषा): वैसा गणितीय कथन, जिसे किसी गणितीय अवधारणा के विकास के लिए  प्रारंभिक कथन के रूप में सत्य स्वीकार कर लिया जाता है, अभिगृहीत कहलाता है.

प्रमेय : प्रमेय एक गणितीय कथन है, जिसे तर्कसंगत विधि से अभिगृहीतों और ज्ञात परिणामों (जिसे पहले ही प्रमाणित किया जा चुका हों) की सहायता से प्रमाणित किया गया हो. किसी गणितीय पुस्तक या किसी गणितीय शोध पत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिणामों को प्रमेय के अंतर्गत रखा जाता है.

उपपत्ति या प्रमाण : किसी गणितीय कथन की सत्यता के पक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्कसंगत कथनों को उपपत्ति या प्रमाण कहा जाता है.

उपप्रमेय : किसी प्रमेय का उपप्रमेय एक गणितीय परिणाम है, जिसकी उपपत्ति सामान्यतः छोटी होती है और उस  प्रमेय पर आधारित होती है. सामान्यतः किसी प्रमेय की विशेष स्थिति को उपप्रमेय के रूप में व्यक्त किया जाता है.

उदाहरण के लिए,  प्रमेय "किसी आयत के सभी कोण समकोण होते हैं" का एक उपप्रमेय है: किसी वर्ग के सभी कोण समकोण होते हैं.

प्रतिज्ञप्ति : प्रतिज्ञप्ति भी वैसा गणितीय कथन है, जिसे प्रमाणित किया जा चुका हो, परन्तु यह परिणाम प्रमेय से कम महत्त्वपूर्ण हो.

प्रमेयिका : किसी प्रमेय को प्रमाणित करने में सहायक परिणाम (जिसे पहले ही प्रमाणित किया जा चुका है) को प्रमेयिका कहा जाता है. 

किसी प्रमेय की उपपत्ति को आसान और सुग्राह्य बनाने के उद्देश्य से उस प्रमेय की उपपत्ति के कुछ अंश को कई प्रमेयिकाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, और उनका प्रयोग उपपत्ति के अंतर्गत किया जाता है. कभी - कभी किसी प्रमेयिका की उपपत्ति बहुत ही कठिन और लंबा हो सकता है.

इन शब्दावलियों का प्रयोग देखने के लिए यह लेख देखें.

अनुमान : अनुमान एक गणितीय कथन है, जिसे प्रमाणित नहीं किया गया हो, परन्तु जो सत्य प्रतीत होता हों. किसी गणितीय कथन को अनुमान तभी कहा जा सकता है, यदि इसे सार्वजनिक रूप से प्रस्तावित किया गया हो. साथ ही, इसके सत्य होने की संभावना के पक्ष में कुछ साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हों.

अनुमान प्रस्तावित करने वाले व्यक्ति का नाम उस अनुमान के साथ संयुक्त किया जा सकता है. उदाहरण - गोल्डबाख अनुमान, कोलाज़ अनुमान, इत्यादि. अनुमान को जब प्रमाणित कर दिया जाता है, तब वह प्रमेय बन जाता है.

प्रमेय का विलोम:  प्रमेय के दो महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं - शर्त और निष्कर्ष. शर्तों को ध्यान में रखते हुए निष्कर्ष को प्रमाणित किया जाता है. इसके विपरीत यदि प्रमेय में इन दोनों के स्थान को परस्पर बदल दिए जाएँ, तो परिणामी कथन को उस प्रमेय का विलोम कहा जाता है.

किसी प्रमेय का विलोम सत्य भी हो सकता है या सत्य नहीं भी हो सकता है. यदि विलोम भी सत्य प्रमाणित कर दिया जाए, तो वह स्वयं एक प्रमेय होता है. उदाहरण के लिए, ज्यामिति का एक प्रमेय लीजिए - "यदि किसी त्रिभुज की दो भुजाएँ बराबर हों, तो इन भुजाओं के सम्मुख कोण बराबर होते हैं." यहाँ शर्त है - दो भुजाओं का बराबर होना, और निष्कर्ष है - सम्मुख कोणों का बराबर होना. इस प्रमेय का विलोम यह होगा - "यदि किसी त्रिभुज के दो कोण बराबर हों, तो इन कोणों के संगत भुजाएँ बराबर होती हैं". वास्तव में यह कथन सत्य है और स्वयं एक प्रमेय है.

उल्लेखनीय है कि कोई गणितीय परिणाम किसी पुस्तक में या शोध पत्र में प्रमेय के रूप में लिखा हो सकता है और वही परिणाम किसी अन्य पुस्तक में प्रमेयिका या प्रतिज्ञप्ति के रूप में लिखा हो सकता है. इसका कारण यह है कि कोई परिणाम जो किसी शोध पत्र में  महत्त्वपूर्ण परिणाम के रूप में व्यक्त किया गया है, वह वहाँ पर प्रमेय के रूप में लिखा जाएगा. परन्तु किसी अन्य शोध पत्र में यदि उसी परिणाम का उपयोग किसी अन्य महत्त्वपूर्ण प्रमेय की उपपत्ति में किया गया हो, तो पहले परिणाम को प्रमेयिका के रूप में लिखा जाएगा. इस प्रकार इन शब्दावलियों का प्रयोग प्रसंग के अनुसार ही करना चाहिए.

गणित में इन शब्दालियों के स्थान पर कभी - कभी अन्य शब्दावलियों का प्रयोग भी देखने को मिलता है. जैसे सांख्यिकी में वृहत संख्या प्रमेय के स्थान पर वृहत संख्या नियम का प्रयोग प्रचलित है; त्रिकोणमिति में कोज्या नियम प्रचलित है; गणितीय विश्लेषण में निम्नतम परिबंध सिद्धांत, संख्या सिद्धांत में आगमन सिद्धांत, युक्लिडीय विभाजन कलन विधि इत्यादि. क्योंकि ये शब्दावलियाँ पहले से ही प्रचलित हैं, इनको इसी रूप में लिखा जाता है.

कभी - कभी गणित में अशुद्ध शब्दावलियों के प्रयोग के भी उदाहरण मिलते हैं.  उदाहरण के लिए, पुस्तकों में "फर्मा का अनुमान" के जगह "फर्मा का अंतिम प्रमेय" का प्रयोग किया जाता रहा. परन्तु यह अनुमान अब सही में प्रमेय बन चुका है. इस अनुमान को 1937 में फ्रांसिसी गणितज्ञ पियरी फर्मा ने प्रस्तुत किया था, जिसे संख्या -सिद्धांत की कठिनतम समस्याओं में गिना जाता है. गणितज्ञों के 358 वर्षों के प्रयास के बाद अंततः 1994 में ब्रिटिश गणितज्ञ वाइल्स ने इस अनुमान को प्रमाणित किया और उसके बाद से यह अनुमान अब वास्तव में प्रमेय बन चुका है.

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