परिचय


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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

योज्य संख्या सिद्धांत : परिचय

योज्य संख्या सिद्धांत (Additive Number Theory) संख्या सिद्धांत (Number Theory) की एक शाखा है, जिसके अंतर्गत योज्य समुच्चयों (additive sets) और इनके योग-समुच्चयों (sumsets) का अध्ययन किया जाता है | योज्य समुच्चय किसी योज्य क्रमविनिमेय समूह (Additive Abelian Group), अर्थात एक ऐसा समूह, जिसमें योग की संक्रिया परिभाषित हो और यह संक्रिया क्रमविनिमेय हो, का उपसमुच्चय होता है | योज्य समुच्चय को आविष्ट करने वाले योज्य क्रमविनिमेय समूह को समावेशी समूह (Ambient Group) कहते हैं | उदाहरण के लिए, पूर्णांकों का समुच्चय $\mathbb{Z}$ एक योज्य क्रम विनिमेय समूह हैं और इनके उपसमुच्चय $\{1, 2, 3, 4\}$ और $\{p : p ~\text{एक अभाज्य संख्या है}~\}$ योज्य समुच्चय हैं | एक ही समावेशी समूह $G$ के दो या दो से अधिक योज्य समुच्चयों का योग - समुच्चय समूह $G$ के वैसे अवयवों का समुच्चय होता है, जिन्हें कुछ निश्चित प्रतिबंधों के अधीन योज्य समुच्चयों के अवयवों के योगफल के रूप में लिखा जा सकता है |

रविवार, 21 दिसंबर 2014

रामानुजन – गाथा : चयनित पंक्तियाँ

रामानुजन – गाथा



महानतम भारतीय गणितज्ञ - संख्या -सिद्धांत शास्त्री श्रीनिवास रामानुजन की १२७वीं जयंती के उपलक्ष्य में सादर समर्पित !

[प्रस्तुत कविता–अंश अपनी दैनंदिनी (डायरी) “ गणिताञ्जलि ” से उद्धरित है]



थे रामानुजन गणितज्ञ ऐसे, जिन्हें विश्व समादर देते थे।
जिनकी मोहिनी प्रतिभा के आगे सब , नतमस्तक हो जाते थे॥ १ ॥

अंक ही उनकी दुनिया , अंकों में खोए रहते थे।
अंक ही उनका ईश्वर, उन्हें ही वे पूजते थे॥ २ ॥

हमारी भारत माता ने , कितने रत्नों को जन्म दिया।
उन रत्नों ने ज्ञानदीप से , विश्व को प्रकाशमान किया॥ ३ ॥

ईश्वी सन अठारह सौ सतासी , बाईस दिसंबर आया था।
चिरस्मरणीय विश्व में सुन्दर , क्षण यह बनकर आया था॥ ४ ॥

गौरवपूर्ण दिवस यह , रामानुजन का अवतार हुआ।
गणित के इतिहास में , नयी प्रतिभा का आविर्भाव हुआ॥ ५ ॥
..........
पाँच वर्ष की उम्र में उसने , अपना विद्यारम्भ किया ।
अपनी प्रतिभा से शिक्षकों को ,चकित करना शुरू किया॥ १० ॥
....................
गणित में सर्वप्रथम आना, रामानुजन की अभिलाषा थी ।
अपर प्राइमरी कक्षा की , फिर से आई परीक्षा थी ॥ १८ ॥

बयालीस अंक पैंतालीस में से , अंकगणित में उन्होंने प्राप्त किया ।
शत प्रतिशत अंक प्राप्त न कर पाने का , भारी पश्चाताप हुआ ॥ १९ ॥

दुखकातर ह्रदय उनका , घंटों अश्रुपात किया।
गणित ही उनका जीवन , गणित से बड़ा ही प्रेम किया ॥ २० ॥
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प्रथम शोधपत्र था उनका, नवीन और अत्यंत दुरूह |
सामान्य पाठक के लिए वह, न समझा गया अनुकूल ||६८||
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विश्व को उनकी प्रतिभा का, अब जाकर आभास हुआ |
कई गणितज्ञों से उनका सार्थक पत्राचार हुआ ||८४||
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सन तेरह में जनवरी सोलह को हार्डी को प्रथम पत्र लिखा |
प्रमेयों से परिपूर्ण वह पत्र, इतिहास में विश्व – प्रसिद्द हुआ ||८८||
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प्रथमतः हार्डी ने उनके, शोधपत्र को समझा था |
उनकी अनोखी प्रतिभा को अपार अलौकिक माना था ||९८||
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ट्रिनिटी कॉलेज में प्रवेश पाकर कैम्ब्रिज वे चले गये |
अलौकिक प्रतिभा से सबको, विस्मित वे करने लगे ||११४||
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अठारह फरवरी सन अठारह, विश्व आज गौरवान्वित था |
रॉयल सोसायटी लंदन ने, अपना फैलो मनोनीत किया था ||१५२||
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मद्रास विश्विद्यालय ने भी, उनका समुचित सम्मान किया |
गणित प्राचार्य का पदविशेष, तत्क्षण उनके लिए सृजित किया ||१५८||
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भारत की प्रतिभा, भारत की काया, इंग्लैंड उनके प्रतिकूल था |
ठंडी जलवायु, गिरती सेहत, लौटना भारत श्रेयस्कर था ||१६१||


उस शोध – भूमि को छोड़ उन्होनें, भारत प्रस्थान किया |
वहां पर अब शोध न कर पाने का, उन्हें अत्यंत खेद हुआ||१६२||
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कैसे होते स्वस्थ? ईश्वर को यह मंजूर न था |
गणित – साधना को विराम देना, रामानुजन को मंजूर न था ||१७७||


अंत समय भी, मोक थीटा फंक्शन पर काम किया |
घनिष्ठ मित्र हार्डी को, उन परिणामों से सूचित किया ||१७८||
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विकट संकट में नहीं झुकने वाले, काल को वे पराजित कर न सके |
अपने अनगिनत प्रेमी जन को, वे रोने से न रोक सके ||१८३||


सन बीस में अप्रील छब्बीस को, वे ब्रह्माण्ड में समा गये |
अपनी स्मृति को वे जनमानस में छोड़ गये ||१८४||

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

अनुक्रम और उनकी सीमाएँ :: भाग - 1: अनुक्रम क्या है ?

अनुक्रम और उनकी सीमाएँ

प्रस्तुत लेखमाला में अनुक्रम और उनकी सीमाओं की गणितीय अवधारणा की परिचयात्मक व्याख्या कुछ उदाहरणों की सहायता से सरल शब्दों में की गई है |


भाग-1: अनुक्रम क्या है ?


गणितीय विश्लेषण (Mathematical Analysis) के पाठ्यक्रम का प्रारंभ प्रायः अनुक्रमों (sequences) और उनकी सीमाओं (limits) के अध्ययन से होता है | अतः हम अनुक्रम की परिभाषा से शुरुआत करते हैं | वस्तुओं के क्रमित सूची को अनुक्रम कहा जाता है | ध्यान दें कि अनुक्रम में क्रम महत्वपूर्ण है , जबकि वस्तुओं के समुच्चय में क्रम का कोई महत्त्व नहीं होता है | अनुक्रम में सूचीबद्ध अवयवों में प्रत्येक अवयव को पद (term)कहा जाता है | अनुक्रम के पद कुछ भी हो सकते हैं, जैसे - संख्याएँ, रंग, नाम, प्रतीक इत्यादि | अनुक्रम में एक ही पद पुनरावृत हो सकते हैं, परन्तु समुच्चय में एक अवयव एक ही बार लिखा जाता है | इस प्रकार अनुक्रम और समुच्चय दो भिन्न गणितीय वस्तुएँ हैं | अनुक्रमों के कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं :

बुधवार, 12 नवंबर 2014

ऋण संख्याएँ, पूर्णांक संख्याएँ और परिमेय संख्याएँ



संख्याओं की आधारशिला : भाग - 5  



अपने पिछले लेख प्राकृत संख्याएँ और भिन्न संख्याएँ  में हमने देखा की ये संख्याएँ गणित के अतिरिक्त सामान्य व्यावहारिक समस्याओं के समाधान के लिए प्रयुक्त होती हैं | परन्तु गणितीय उद्देश्यों की पूर्ति में ये संख्याएँ पर्याप्त सिद्ध नहीं होतीं | उदाहरण के लिए, प्राकृत संख्याएँ व्यवकलन की संक्रिया के सापेक्ष संवृत नहीं है, अर्थात हम सदैव ही दो संख्याओं का अंतर ज्ञात नहीं कर सकते | उदाहरण के लिए हम $7 - 5$ तो ज्ञात कर सकते हैं, परन्तु प्राकृत संख्याओं के समुच्चय में $5 - 7 $ का कोई समाधान नहीं है | इस समस्या के समाधान के लिए, प्रस्तुत लेख में हम ऋण संख्याओं, पूर्णांक संख्याओं और परिमेय संख्याओं की गणितीय संकल्पना प्रस्तुत करेंगे और दिखाएँगे कि इन संख्याओं की सहायता से उपरोक्त समस्याओं का समाधान किया जा सकता है |

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

भिन्न संख्याएँ

संख्याओं की आधारशिला : भाग - 4  

अपने पिछले लेख प्राकृत संख्याएँ में हमने देखा की ये संख्याएँ गिनती के लिए प्रयुक्त होती हैं | परन्तु अपने दैनिक जीवन में हमें कई ऐसे अभिकलन करने होते हैं, जिनमें प्राकृत संख्या पर्याप्त सिद्ध नहीं होतीं | उदाहरण के लिए, दिए गए वस्तुओं को कई व्यक्तियों के बीच समान रूप से वितरण करने की समस्या | इस उद्देश्य हेतु हमें भिन्न संख्याओं की आवश्यकता पड़ती है | प्रस्तुत लेख में हम भिन्न संख्याओं के गणितीय संकल्पना पर चर्चा करेंगे और व्यावहारिक जीवन की समस्याओं से इसका संबंध स्थापित करते हुए इनके गुणधर्मों का विवेचन करेंगे |

रविवार, 7 सितंबर 2014

अंकगणितीय संक्रियाएँ

संख्याओं की आधारशिला : भाग - ३  

अपने पिछले लेख प्राकृत संख्याएँ में हमने प्राकृत संख्याओं की अभिगृहीतीय आधारशिला रखी | वहाँ हमने योग और गुणन की संक्रियाएँ भी परिभाषित की | प्रस्तुत लेख में हम इन संक्रियाओं से संबंधित नियमों की चर्चा करेंगे | अंत में हम प्राकृत संख्याओं के निकाय की बीजगणितीय परिभाषा देंगे और इस परिभाषा से प्रेरित होकर हम अमूर्त बीजगणितीय निकाय को भी परिभाषित करेंगे | इस बीजीय निकाय की संकल्पना पूर्णांक संख्याओं की आधारशिला रखने में प्रयुक्त की जाएगी |

शनिवार, 30 अगस्त 2014

भास्कराचार्य



       प्राचीन भारत के प्रसिद्द गणितज्ञों में गणितीय ग्रंथ लीलावती  के रचयिता भास्कराचार्य का महत्वपूर्ण स्थान है | लीलावती वास्तव में भास्कराचार्य रचित ग्रंथ सिद्धांत-शिरोमणि  का ही एक भाग है | यह ग्रंथ गणित और ज्योतिष विषय का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है और यह संस्कृत भाषा में काव्यात्मक शैली में श्लोकबद्ध है | इस ग्रंथ में वर्णित नियमों की व्याख्या करने के लिए भास्कराचार्य ने गद्य शैली में वासना  नामक एक ग्रंथ लिखा सिद्धांत-शिरोमणि  के चार भाग हैं - लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित | लीलावती में अंकगणित (पाटीगणित) पर, बीजगणित में बीजगणित पर, गोलाध्याय में खगोल पर और ग्रहगणित में ग्रहों की गति पर चर्चा की गई है | सिद्धांत-शिरोमणि के अतिरिक्त भास्कराचार्य ने एक और ग्रंथ करण-कुतूहल की रचना की थी, जिसमें पंचांग बनाने की विधियों पर चर्चा की गयी है | लीलावती पर कई टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं और देश-विदेश की कई भाषाओँ में अनुवाद किये गए हैं |

बुधवार, 27 अगस्त 2014

गिज़ेप पियानो (गणितज्ञ)

गिज़ेप पियानो (इतालवी [dʒuzɛppe Peano], 27 अगस्त, 1858 - 20 अप्रैल 1932) एक इतालवी गणितज्ञ थे | उन्होंने दो सौ से अधिक पुस्तकों और पत्रों की रचना की | उन्होंने गणितीय तर्क शास्त्र की आधारशिला रखी | इन विषयों में प्रयुक्त अधिकतर संकेतों का श्रेय उन्हीं   को प्राप्त है | उन्होंने ही प्राकृत संख्या निकाय की अभिगृहितीय संकल्पना प्रस्तुत की थी और इसीलिये उनके सम्मान में इन अभिगृहितों को पियानो अभिगृहीत के नाम से जाना जाता है | इस कार्य के ही फलस्वरूप उन्होंने गणितीय आगमन सिद्धांत की परिशुद्ध व सुव्यवस्थित संकल्पना विकिसित की | आधुनिक गणित में उनका यह योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है | उन्होंने अपना अधिकांश जीवन ट्यूरिन विश्वविद्यालय में गणित अध्यापन में समर्पित किया |
 
पियानो अभिगृहीत :                                  
   1. शून्य (0) एक प्राकृत संख्या है |

  2. प्रत्येक प्राकृत संख्या की अनवुर्ती संख्या प्राकृत संख्या होती है।

  3. भिन्न-भिन्न प्राकृत संख्याओं की अनुवर्ती संख्याएँ भी अलग-अलग होंगी।

  4. शून्य  (0) किसी भी प्राकृत संख्या की अनुवर्ती नहीं है |

 5. यदि K कोई ऐसा समुच्चय है जो निम्न प्रतिबंधों को संतुष्ट करता है: (i) 0 समुच्चय K का सदस्य है, (ii) प्रत्येक प्राकृतिक संख्या n के लिए, यदि n समुच्चय K का सदस्य है, तो उसकी अनुवर्ती संख्या भी K का सदस्य है. उपरोक्त प्रतिबंधों के संतुष्ट होने पर सभी प्राकृतिक संख्याएँ K की सदस्य होंगी। इसे 'आगमन अभिगृहीत' कहा जाता है।

प्राकृत संख्याओं की आधारशिला पर विस्तृत जानकारी के लिए निम्नलिखित लेख द्रष्टव्य हैं :






मंगलवार, 26 अगस्त 2014

गणितीय आगमन सिद्धांत

गणितीय कथन को प्रमाणित या अप्रमाणित करने के लिए गणितीय तर्क पर आधारित जिन कथनों को प्रस्तुत किया जाता हैउन्हें उपपत्ति (प्रमाण) कहा जाता है. उपपत्ति की कई विधियाँ होती हैंजिनका अध्ययन प्रायः गणितीय तर्कशास्त्र के अंतर्गत किया जाता है. इन विधियों में एक महत्वपूर्ण विधि गणितीय आगमन सिद्धांत है. प्रस्तुत लेख में इस विधि पर विस्तार से चर्चा की जाएगी.

रविवार, 24 अगस्त 2014

प्राकृत संख्याएँ


संख्याओं की आधारशिला : भाग -२  
अपने पिछले लेख गणना में हमने गिनती की अवधारणाओं पर विस्तृत चर्चा की और इस क्रम में हम प्राकृत संख्याओं से भी परिचित हुए | परन्तु वहाँ हमने इन संख्याओं के अन्तर्निहित गुणधर्मों पर कोई चर्चा नहीं की | हमने केवल यह जाना कि ये संख्याएँ गिनती में प्रयुक्त होने वाले संकेत हैं जिनका एक सुनिश्चित क्रम है | परन्तु प्राकृत संख्याओं को परिभाषित करने के लिए इतनी बातें ही पर्याप्त नहीं हैं | प्रस्तुत लेख में हम इस विषय पर विस्तृत विश्लेषण करेंगे कि प्राकृत संख्याओं को किस तरह परिभाषित किया जा सकता है | हम इन संख्याओं के विशिष्ट गुणधर्मों का भी विस्तृत विश्लेषण करेंगे और सुपरचित योग और गुणन की संक्रियाओं को परिभाषित करेंगे |

सोमवार, 28 जुलाई 2014

गणना या गिनती (Counting)

गणना

संख्याओं की आधारशिला : भाग -1

गणना या गिनती  (Counting) से हम क्या समझते हैं ? आइये, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करें.

अपने प्रत्येक दिन के जीवन में हमें कई बार यह जानने या बताने की आवश्यकता होती कि कोई वस्तु कितने मात्रा में उपलब्ध हैं या दो समूहों में से किस समूह में अधिक वस्तुएँ हैं. यदि हम यह जानना चाहें  कि किसी विद्यालय में कितने छात्र हैं तो हम क्या करते है ? वास्तव में हम छात्रों को गिनते हैं. यह प्रक्रिया "गणना" या "गणन प्रक्रिया" कहलाती है. परन्तु यह प्रक्रिया क्या आसान है ?
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