परिचय


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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

कोलाज़ अनुमान (Collatz Conjecture)

              संख्या - सिद्धांत की यह विशेषता है कि इस विषय से संबंधित समस्याओं या प्रश्नों को आसानी से समझा जा सकता है और व्यक्त किया जा सकता है | परन्तु इन समस्याओं का हल करना अत्यंत दुरूह हो सकता है | परन्तु किसी प्रश्न को हल करने हेतु उस प्रश्न के कथन को ठीक – ठीक समझना अत्यंत आवश्यक है | गणित की अन्य शाखाओं में ऐसी बातें देखने को बहुत कम मिलती हैं | वहाँ किसी प्रश्न या समस्या को ही समझना अत्यंत कठिन होता है और बिना प्रश्न समझे उसे हल करना संभव नहीं है | संख्या – सिद्धांत के साथ ऐसी बातें नहीं हैं | इनकी समस्याओं को माध्यमिक कक्षा के छात्र भी समझ सकते हैं और उन्हें हल करने के लिए चिंतन - मनन कर सकते हैं | कोई छात्र भले ही किसी दिए गए प्रश्न को पूर्णतः हल नहीं कर पाएँ, परन्तु इस दिशा में प्रयास करने पर उन्हें कई गणितीय संकल्पनाओं की जानकारी हो जाती है, उनकी रूचि गणित और गणितीय शोध में बढ़ जाती है | यहाँ हम संख्या – सिद्धांत की एक ऐसी ही समस्या प्रस्तुत कर रहे हैं, जो 75 वर्षों से ज्यादा पुरानी हैं और इस समस्या का हल खोजने में गणितज्ञ अभी तक सफल नहीं हुए हैं | समस्या इस प्रकार है:

            कोई भी धनात्मक प्राकृत संख्या चुनें | यदि यह संख्या सम संख्या है, तो इसे दो से विभाजित करें और यदि यह संख्या विषम संख्या है, तो इसे तीन से गुणा करें और गुणनफल में एक जोड़ें | इस प्रक्रिया के फलस्वरूप हमें एक अन्य धनात्मक प्राकृत संख्या प्राप्त होगी | इस संख्या पर पुनः उपरोक्त प्रक्रिया दुहरायें और यह प्रक्रिया तब तक दुहराते रहें, जबतक की संख्या एक प्राप्त न हो जाएँ | अब प्रश्न यह है की क्या यह संभव है कि हमें सदैव ही कुछ चरणों के बाद संख्या 1 अवश्य प्राप्त होगा ? यदि हाँ, तो इसे कैसे सिद्ध किया जा सकता है ? यदि नहीं, तो इसका कोई प्रतिउदाहरण खोजें, जिसपर उपरोक्त प्रक्रिया बार – बार लागू करने पर कभी भी 1 प्राप्त न हो |

            इस अनुमान को जर्मन गणितज्ञ कोलाज़ (Collatz) ने 1937 में प्रस्तुत किया था और उनके नाम पर इस समस्या को कोलाज़ अनुमान (Collatz Conjecture) कहा जाता है | कोलाज़ अनुमान को कम्प्युटर द्वारा 1 से लेकर 19•2^(58) = 5.48×10^(18) (सन्निकट मान) तक जाँच किया गया और सही पाया गया है | परन्तु इसका कोई प्रति – उदाहरण अभी तक नहीं खोजा जा सका है और न ही इसकी सत्यता सिद्ध की गई है | उदाहरण के लिए, यदि हम 6 से शुरुआत करें तो उपरोक्त प्रक्रिया से क्रमशः निम्नलिखित संख्याएँ प्राप्त होती हैं और अंततः 1 प्राप्त होता है: 6, 3, 10, 5, 16, 8, 4, 2, 1.

           थ्वाइत्स (Thwaites) ने 1996 में इस समस्या के हल करने पर £1000 का पुरस्कार रखा है | महान गणितज्ञ इर्दोस (Erdos) ने इस समस्या के बारे में कहा था – “गणित इस तरह की समस्याओं के लिए अभी सक्षम नहीं है |”

इस समस्या से संबंधित अत्यधिक जानकारी यहाँ उपलब्ध हैं:
http://en.wikipedia.org/wiki/Collatz_conjecture
http://mathworld.wolfram.com/CollatzProblem.html

गोल्डबाख़-अनुमान (Goldbach's Conjecture)

संख्या - सिद्धांत में "गोल्डबाख़-अनुमान (Goldbach's Conjecture)" अनसुलझे समस्याओं में अत्यंत प्राचीन व सर्वविदित समस्या है | यह समस्या लगभग 273 वर्षों से गणितज्ञों के लिए चुनौती बनी हुई है | इस अनुमान को जर्मन गणितज्ञ गोल्डबाख़ ने 7 जून 1742 को ऑयलर को लिखे एक पत्र में व्यक्त किया था | इस अनुमान के अनुसार "दो से बड़ी प्रत्येक सम संख्या को दो अभाज्य संख्याओं के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है |" सम संख्याएँ वैसी प्राकृत संख्याएँ हैं, जिन्हें दो से पूर्णतः विभाजित किया जा सकता है, जैसे 0, 2, 4, 6 इत्यादि | अभाज्य संख्याएँ वैसी प्राकृत संख्याएँ हैं, जिन्हें 1 और उसी संख्या के अतिरक्त और किसी संख्या से विभाजित नहीं किया जा सके | उदाहरण के लिए, 2, 3, 5, 7, 11, 13 इत्यादि अभाज्य संख्याएँ हैं, परन्तु 4 अभाज्य संख्या नहीं है, क्योंकि इसे 1 और 4 के अतिरिक्त 2 से भी विभाजित किया जा सकता है | उपरोक्त समस्या का सत्यापन 4 × 10^18 (4 पर अठारह शून्य) तक की संख्याओं के लिए कम्प्यूटर द्वारा किया जा चुका है और गणितज्ञों द्वारा ऐसा विश्वास किया जाता है कि यह अनुमान सत्य है |
नीचे के चित्र में 4 से 50 तक की सम संख्या को दो अभाज्य संख्याओं के योगफल के रूप में दर्शाया गया है |


जुड़वाँ अभाज्य अनुमान (Twin Prime Cnjecture)

संख्या–सिद्धांत के अनसुलझे समस्याओं में से एक महत्त्वपूर्ण समस्या “ जुड़वाँ अभाज्य अनुमान (twin prime conjecture)” है | यदि दो क्रमागत अभाज्य संख्याओं के बीच अंतर 2 हो, तो उन अभाज्य संख्याओं को “जुड़वाँ अभाज्य” कहा जाता है | उदाहरण के लिए, (3, 5), (5, 7), (11, 13), (17, 19), (29, 31), (41, 43) इत्यादि | उपरोक्त अनुमान कहता है कि ऐसे जुड़वाँ अभाज्य-युग्मों की संख्या अनंत है | अर्थात, ऐसे अभाज्य संख्याओं p की संख्या अनंत है, जिससे कि p+2 भी अभाज्य हों | संख्या-शास्त्रियों का ऐसा विश्वास है कि इस अनुमान के सत्य होने की संभावना अधिक है | हाल ही में इस अनुमान को सत्य साबित करने की दिशा में गणितज्ञों ने महत्त्वपूर्ण शोध किये हैं | 17 अप्रैल 2013 को गणितज्ञ यितांग झांग (Yitang Zhang) ने एक महत्त्वपूर्ण परिणाम की घोषणा की जिसके अनुसार ऐसे अभाज्य-युग्मों की संख्या अनंत हैं, जिनके बीच अंतर अधिक से अधिक 7 करोड़ है | उनका यह परिणाम गणितीय शोध पत्रिका “Annals of Mathematics” में एक शोध-पत्र में मई 2013 में प्रकाशित हुआ था | इस परिणाम को और ज्यादा परिशुद्ध करने और इस दिशा में विस्तृत शोध के लिए गणितज्ञ टेरेंस टाउ (Terence Tao) ने एक गणित-परियोजना ‘’Polymath Project” की शुरुआत की | इस परियोजना का उद्देश्य झांग के परिणाम पर शोध कर ऐसे परिणाम की खोज करनी है जिसके द्वारा अभाज्य-युग्मों के बीच अंतर कम साबित किया जा सके | अप्रैल 2014 तक इस अंतर को 246 तक कम किया जा सका है | इस अंतर को जेम्स मेनार्ड (James Maynard) और टेरेंस टाउ (Terence Tao) ने स्वतंत्र रूप से प्राप्त किया है |
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