परिचय


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मंगलवार, 10 मई 2016

गणितज्ञ कैसे बनें ? तीसरी कड़ी : $ab =ba$ क्यों ?


"गणितज्ञ कैसे बनें ?" गणितीय आलेखों की एक श्रृंखला है, जिसके अंतर्गत विविध गणितीय विषयों पर ऐसे लेख प्रस्तुत किये जाते हैं, जो पाठकों को ज्ञात गणितीय तथ्यों, परिणामों और सूत्रों को स्वयं खोजने के लिए क्रमबद्ध तरीके से प्रेरित करते हैं और जिनसे उनके अंदर गणितीय शोध की स्वाभाविक प्रवृति जागृत होती है.

 
प्रारंभिक बीजगणित (elementary algebra) के पाठ्यक्रम में बीजीय व्यंजकों (algebraic expressions) से संबंधित समस्याओं को हल करते समय  हम सदैव $ab$ और $ba$ को समान मानते हैं. उदाहरण के लिए, हम तत्समक (identity) $(a + b)^2 = a^2 + 2ab + b^2$ को सिद्ध करते समय इस मान्यता का प्रयोग करते हैं कि $ab = ba$. इसे नीचे सपष्ट किया गया है :
\begin{align*}
(a+b)^2 &= (a+b)(a+b) \\
&= a(a+b)+ b(a+b)\\
&=a^2 + ab + ba + b^2\\
&=a^2 + ab + ab + b^2 ~~~~~~~~~~~~~~~~\text{[क्योंकि $ab =ba$]}\\
&=a^2 + 2ab + b^2
\end{align*}

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

द्विघातीय समीकरण

द्विघातीय समीकरण प्रारंभिक बीजगणित के क्षेत्र में अध्ययन की एक महत्त्वपूर्ण विषय - वस्तु है. प्रस्तुत लेख में इस समीकरण ,इसके हल की विधियों  और इसके इतिहास पर विस्तृत चर्चा की गई है.

1. परिचय 

द्विघातीय समीकरण  (quadratic equation) द्वितीय घात वाला एक बहुपद समीकरण (polynomial equation) है, जिसका व्यापक रूप
\begin{equation}\label{qe}
ax^2 + bx + c = 0
\end{equation}
होता है, जहाँ $a, b, c$ अचर (constant) हैं और $a$ शून्येतर (nonzero) है. यदि $a = 0$, तो उपरोक्त समीकरण रैखिक समीकरण (linear equation) होता है. ये अचर या तो वास्तविक संख्या (real numbers) होते हैं या सम्मिश्र संख्या (complex numbers) या किसी व्यापक क्षेत्र (field) के अवयव हो सकते हैं. यदि सभी अचर वास्तविक संख्याएँ हों, तो उपरोक्त समीकरण को वास्तविक द्विघातीय समीकरण  (real quadratic equation) कहा जाता है. ध्यान दें कि उपरोक्त समीकरण में केवल एक चर (variable) $x$ विद्यमान है. अतः ऐसे समीकरण को कभी - कभी एक चर वाले द्विघातीय समीकरण  (quadratic equation of single variable) भी कहते हैं. प्रस्तुत लेख में हम केवल वास्तविक द्विघातीय समीकरण पर चर्चा करेंगे और जब तक कि स्पष्ट रूप से न कहा जाए, द्विघातीय समीकरण से हमारा तात्पर्य होगा - वास्तविक द्विघातीय समीकरण. द्विघातीय समीकरण के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं.
\begin{align}
x^2 &= 0  \label{ex1} \\
x^2 - 1 &= 0 \label{ex2}\\
x^2 + 1 &= 0 \label{ex3}\\
x^2 + 5x + 6 &= 0  \label{ex4}\\
x^2 +2 x + 1 &= 0 \label{ex5}\\
x^2 - x + 1 &= 0 \label{ex6}\\
\sqrt{2}x^2 + 3x - \sqrt{3} &= 0. \label{ex7}
\end{align}

समीकरण $(\ref{qe})$ और समीकरण $(\ref{ex3})$ द्विघातीय समीकरण का मानक रूप (standard form) है. कुछ द्विघातीय  समीकरण मानक रूप में नहीं होते हैं. परन्तु इन्हें मानक रूप में परिवर्तित किया जा सकता है. उदाहरण के लिए समीकरण 
\[2x + 1 = \frac{5x + 1}{3x-1}\]
एक द्विघातीय समीकरण है, जो मानक रूप में नहीं है. इस समीकरण को सरल कर मानक रूप में निम्नलिखित द्विघातीय समीकरण के रूप में लिखा जा सकता है.
\[6x^2 - 4x - 2 = 0.\]

किसी संख्या (वास्तविक या सम्मिश्र) $\alpha$ को समीकरण $(\ref{qe})$ का मूल (root) या शून्यक (zero) कहा जाता है, यदि चर $x$ के इस मान के लिए यह समीकरण संतुष्ट होता हो, अर्थात
\[a\alpha^2 + b\alpha + c = 0.\]

रविवार, 19 जुलाई 2015

गणितीय शब्दावलियों की व्याख्या-2

गणित में प्रयुक्त होने वाली कुछ शब्दावलियाँ

शंकु (cone) से हम सभी परिचित है. निर्देशांक ज्यामिति (co-ordinate geometry) में हम परवलय (parabola), दीर्घवृत्त (ellipse) और अतिपरवलय (hyperbola) का अध्ययन करते हैं. इन तीनों वक्रों को शांकव (conics) कहा जाता है, क्योंकि शंकु को किसी समतल (plane) द्वारा अलग अलग तरीके से प्रतिच्छेद करने पर ये वक्र प्राप्त होते हैं (नीचे का चित्र देखें). शांकव का अर्थ होता है - शंकु से उत्पन्न, ठीक वैसे ही जैसे पांडु से उत्पन्न महाभारत के पात्र पांडव और कुरु से उत्पन्न कौरव और मनु से उत्पन्न मानव. वास्तव में इन शब्दों की व्युत्पत्ति मूल शब्द में अण् प्रत्यय लगाने से हुई है. इस प्रकार शांकव = शंकु + अण्. 
समतल द्वारा शंकु को प्रतिच्छेद करने पर प्राप्त वक्र

इसी प्रकार ठोस ज्यामिति (solid geometry) में हम परवलयज (paraboloid), दीर्घवृत्तज (ellipsoid) और अतिपरवलयज (hyperboloid) का अध्ययन करते हैं. इन्हें शांकवज (conicoid) कहा जाता है, जिसे शांकव में ज प्रत्यय लगाने से प्राप्त होता, जिसका अर्थ होता है - (से) उत्पन्न या (से) जन्मा. इस प्रकार शांकवज का अर्थ हुआ शांकव से उत्पन्न, ठीक वैसे ही जैसे जल से उत्पन्न जलज या पंक (कीचड़) से उत्पन्न पंकज. वास्तव में शांकव को x-अक्ष के प्रति घूर्णन करने पर शांकवज की उत्पत्ति होती है. यदि हम परवलय को x-अक्ष के प्रति घूर्णन कराएँ, तो हमें परवलयज प्राप्त होगा. इसी प्रकार हम दीर्घवृत्तज और अतिपरवलयज प्राप्त कर सकते है.
यह वीडियो भी देखें : https://www.youtube.com/watch?v=BnWEI5o35G8

सोमवार, 6 जुलाई 2015

गणितीय शब्दावलियों की व्याख्या-1

आइए, गणित में प्रायः प्रयुक्त होने वाली कुछ शब्दावलियों की व्याख्या करें !

धनात्मक पूर्णांकों से हम सभी परिचित हैं. इन पूर्णांकों का समुच्चय {1, 2, 3,...} है. इसी प्रकार ऋणात्मक पूर्णांकों का समुच्चय {..., --3, -2, -1} है और पूर्णांकों का समुच्चय {..., -3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, ...} है. कभी - कभी हम यह कहते है कि अमुक कथन शून्येतर पूर्णांकों के लिए सत्य है. इसका अर्थ है कि यह कथन शून्य को छोड़कर अन्य सभी पूर्णांकों के लिए सत्य है. ध्यान दें कि शून्येतर = शून्य + इतर. इतर का अर्थ होता है - (से) भिन्न और इस प्रकार शून्येतर का अर्थ हुआ- शून्य से भिन्न पूर्णांक संख्याएँ यानि धनात्मक और ऋणात्मक पूर्णांक संख्याएँ. इसी प्रकार ॠणेतर पूर्णांक का अर्थ होता है - जो पूर्णांक संख्या ऋण नहीं है, अर्थात शून्य और धनात्मक पूर्णांक संख्याएँ, धनेतर पूर्णांक संख्याओं का अर्थ भी इसी प्रकार परिभाषित है - शून्य और ऋणात्मक पूर्णांक संख्याएँ. आप देख सकते हैं कि गणितीय शब्दावलियों का निर्माण कुछ प्रत्ययों की सहायता से कितनी सुगमता से किया जा सकता है. किसी भी भाषा की शब्दावलियों को समझने के लिए उस भाषा के व्याकरण का ज्ञान आवश्यक है. इन उदाहरणों की सहायता से आप समझ गए होंगे कि गणित में दुरूह दिखने वाले हिंदी पारिभाषिक शब्द वास्तव में कितने आसान और अर्थपूर्ण है....आवश्यकता है तो व्याकरण के नियमों को जानने की.
अगले पोस्ट में कुछ और शब्दावलियों की व्याख्या की जाएगी.

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

त्रिघातीय समीकरण (Cubic Equation)

प्रस्तुत लेख में हम त्रिघातीय समीकरण पर विस्तार से चर्चा करेंगे. 

1. परिचय  

समीकरण
\begin{equation}\label{cubic}
ax^3 + bx^2 + cx + d = 0,
\end{equation}
जहाँ $a, b, c, d, e$ सम्मिश्र संख्याएँ (complex numbers) हैं और $a \neq 0$, के रूप के समीकरण को सम्मिश्र त्रिघातीय समीकरण (complex cubic equation) कहते हैं. यदि गुणांक $a, b, c, d, e$ वास्तविक संख्याएँ (real numbers) हों, तो इसे हम वास्तविक त्रिघातीय समीकरण (real cubic equation) कहते हैं.  कुछ त्रिघातीय समीकरण के उदाहरण नीचे दिए गए हैं.
\begin{align}\label{cubic1}
x^3 &=0\\ \label{cubic2}
2x^3 + 3x^2 -1 &= 0\\
-x^3 + 7x + 2 &= 0\\
x^3 + x^2 + 3x + 11 &= 0.
\end{align}
एक सम्मिश्र संख्या $x = \alpha$ त्रिघातीय समीकरण $(\ref{cubic})$ का हल (solution) या मूल (root) होता है यदि
\[a \alpha^3 + b \alpha^2 + c \alpha + d = 0. \]

गुरुवार, 4 जून 2015

आव्यूह वियोजन (Matrix Decomposition)

किसी आव्यूह (Matrix) को कुछ विशेष प्रकार के आव्युहों के गुणनफल के रूप में लिखने की प्रक्रिया आव्यूह वियोजन (Matrix Decomposition) कहलाती है. आव्यूह वियोजन के द्वारा किसी आव्यूह के गुणधर्मों और उससे संबंधित समस्याओं का अध्ययन आसान हो जाता है, क्योंकि इस प्रक्रिया के द्वारा किसी आव्यूह को ज्ञात गुणधर्मों वाले आव्यूहों के गुणनफल के रूप में व्यक्त किया जाता है.. अतः आव्यूह - सिद्धांत (Matrix Theory) में और अनुप्रयुक्त गणित में इस प्रक्रिया का विशेष महत्त्व है. यहाँ पर हम कुछ विशेष प्रकार के आव्यूह वियोजन, जैसे - शुर वियोजन (Schur Decomposition), स्पेक्ट्रमी वियोजन (Spectral Decomposition),  विचित्र मान वियोजन (Singular Value Decomposition) और ध्रुवीय वियोजन (Polar Decomposition) पर विस्तृत चर्चा करेंगे.

रविवार, 10 मई 2015

गणितज्ञ कैसे बनें ? दूसरी कड़ी : अभाज्य संख्याओं की अनंतता (Infinitude of Prime Numbers)

"गणितज्ञ कैसे बनें ?" गणितीय आलेखों की एक श्रृंखला है, जिसके अंतर्गत विविध गणितीय विषयों पर ऐसे लेख प्रस्तुत किये जाते हैं, जो पाठकों को ज्ञात गणितीय तथ्यों, परिणामों और सूत्रों को स्वयं खोजने के लिए क्रमबद्ध तरीके से प्रेरित करते हैं और जिनसे उनके अंदर गणितीय शोध की स्वाभाविक प्रवृति जागृत होती है.

एक से बड़ी वैसी प्राकृत संख्या (natural numbers) जिसके गुणनखंड केवल $1$ और वही संख्या हों, अभाज्य संख्या (prime number) कहलाती है. दूसरे शब्दों में अभाज्य संख्याओं को $1$ और उस संख्या के अतिरिक्त किसी अन्य संख्या से विभाजित नहीं किया जा सकता है. उदाहरण के लिए $2, 3, 5, 7, 11, 13$ इत्यादि अभाज्य संख्याएँ हैं. परन्तु $4$ एक अभाज्य संख्या नहीं है, क्योंकि इसे $1$ और $4$ के अतिरिक्त $2$ से भी विभाजित किया जा सकता है. इसी प्रकार $6, 8, 9, 10, 12$ इत्यादि अभाज्य संख्याएँ नहीं हैं. ये संख्याएँ संयुक्त संख्याएँ है. एक से बड़ी वैसी प्राकृत संख्या, जो अभाज्य नहीं है, संयुक्त संख्या (composite number) कहलाती है. अभाज्य संख्याओं के गुणधर्मों की विस्तृत जानकारी के लिए अभाज्य संख्याएँ देखें. अंकगणित के मूलभूत प्रमेय (Fundamental Theorem of Arithmetic) से हम जानते हैं कि एक से बड़ी किसी भी प्राकृत संख्या को अभाज्य संख्याओं के गुणनफल के रूप में अद्वितीयतः (uniquely) लिखा जा सकता है. अतः अभाज्य संख्याएँ मूलभूत संख्याएँ  हैं और इन्हें संख्याओं की निर्माण - इकाई कहना तर्कसंगत होगा.
 
हम जानते हैं कि प्राकृत संख्याओं की संख्या अनंत हैं. परिभाषा के अनुसार सभी अभाज्य संख्याएँ प्राकृत संख्याएँ हैं. अतः यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि क्या अभाज्य संख्याओं की संख्याओं भी अनंत है ? प्रस्तुत लेख में हम इसी विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं.
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