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परिचय


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सोमवार, 3 जुलाई 2017

गणित में प्रेक्षण उपपत्ति (प्रमाण) क्यों नहीं हो सकती ?

गणित में प्रेक्षण के ही आधार पर किसी कथन को सत्य नहीं माना जा सकता है. प्रेक्षण सीमित होता है, अतः यह किसी कथन को सार्वत्रिक रूप से सत्य प्रमाणित करने में सक्षम नहीं भी हो सकता है. इसे हम एक उदाहरण के द्वारा समझाएँगे. 

एक बहुपद f(n) = n^2 + n + 41 पर विचार कीजिए. यदि आप n के 0 से लेकर 39 तक के मानों के लिए f(n) का मान परिकलित करें, तो आप पाएँगे कि ये सभी मान अभाज्य संख्याएँ हैं (नीचे के सारणी में देखें).

तो क्या इन प्रेक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है n के किसी भी ऋणेतर मान के लिए f(n) का मान अभाज्य होता है. वास्तव में, ऐसा कहना असत्य होगा. इस कथन को ऑयलर (Euler) ने 1772 ईसवीं में असत्य प्रमाणित किया था. यदि आप उपरोक्त बहुपद का मान n = 40 के लिए परिकलित करें, तो आप पाएँगे कि
f(40) = 40^2 + 40 + 41 = 40(40 + 1) + 41 = 40(41) + 41= 41(40 + 1) = 41^2.
इस प्रकार हम देखते हैं कि यह मान अभाज्य नहीं है. 

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रविवार, 2 जुलाई 2017

अद्वितीय गुणनखंडन: पुनरावलोकन

एक से बड़े किसी भी धन पूर्णांक (positive integers) को अभाज्य संख्याओं (prime numbers) के गुणनफल के रूप में लिखने की प्रक्रिया से हमलोग प्रारंभिक कक्षा में ही परिचित हो जाते हैं. अभाज्य संख्याओं के गुणनफल के रूप में यह निरूपण उस संख्या का अभाज्य गुणनखंडन (prime factorization) कहलाता है. यह निरूपण अद्वितीय (unique) भी होता है, यदि अभाज्य गुणनखंडों के क्रम को महत्त्व न दिया जाए. इस तथ्य को अंकगणित का मूलभूत प्रमेय  (Fundamental Theorem of Arithmetic) के नाम से जाना जाता है. इस प्रमेय का स्पष्ट कथन नीचे दिया गया है. इस प्रमेय की उपपत्ति और इससे संबंधित विस्तृत जानकारी के लिए अंकगणित का मूलभूत प्रमेय नामक लेख पढ़ें.





प्रमेय (अंकगणित का मूलभूत प्रमेय). प्रत्येक धन पूर्णांक n > 1 को अभाज्य संख्याओं के गुणनफल के रूप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:
n = p_1^{e_1} \cdots p_k^{e_k},
जहाँ p_1, \ldots, p_k भिन्न - भिन्न अभाज्य संख्याएँ हैं और e_1, \ldots, e_k धन पूर्णांक हैं. यदि इस निरूपण में अभाज्य गुणनखंडों के क्रम को महत्त्व न दिया जाये तो यह निरूपण अद्वितीय होता है.
 

उदाहरण के लिए, 30 के दो अभाज्य गुणनखंडन 30 =  2\cdot3\cdot5 और 30 = 3 \cdot 2 \cdot 5 समान कहे जाएँगे. 30 का कोई अन्य अभाज्य गुणनखंडन अभाज्य गुणनखंडन संभव नहीं है. अब एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है - क्या ऐसा कोई उदाहरण है, जहाँ अभाज्य गुणनखंडन अद्वितीय नहीं हो, अर्थात किसी संख्या के एक से अधिक अभाज्य गुणनखंडन हों ? मैंने भी पहली बार जब इस प्रमेय को पढ़ा था, तो यह प्रश्न मन में उठा था. परन्तु मैं उत्तर नहीं खोज सका था. इसका उत्तर स्नातक की कक्षा में अमूर्त बीजगणित की पुस्तक में मिला. परन्तु उस उदाहरण को समझने के लिए, हमें वलय, गुणनखंडनीय प्रांत, अखंडनीय अवयव, अभाज्य अवयव इत्यादि की व्यापक परिभाषा की जानकारी आवश्यक है. परन्तु हम एक ऐसे उदाहरण पर चर्चा करना चाहते हैं, जिसे समझने के लिए इन सब चीजों को जानना आवश्यक नहीं है और यह आसान भी है. (दसवीं कक्षा तक के गणित जानने वाले छात्र भी इसे समझ सकेंगे.) इस उदाहरण से मेरा सामना कुछ दिन पहले फ्रेज़र जारविस (Frazer Jarvis) द्वारा लिखित बीजगणितीय संख्या सिद्धांत (Algebraic Number Theory) की पुस्तक [1] पढ़ने के क्रम में हुई. यह उदाहरण इस पुस्तक के अध्याय 4 में पृष्ठ संख्या  65 पर उदाहरण 4.1 में दिया गया है. यह पुस्तक स्नातक-स्तरीय पाठ्यक्रम के लिए है. यहाँ पर हम इस उदाहरण को अत्यंत विस्तार से समझाएँगे.

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