परिचय


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योज्य संख्या सिद्धांत

योज्य संख्या सिद्धांत (Additive Number Theory) संख्या सिद्धांत (Number Theory) की एक शाखा है, जिसके अंतर्गत योज्य समुच्चयों (additive sets) और इनके योग-समुच्चयों (sumsets) का अध्ययन किया जाता है | योज्य समुच्चय किसी योज्य क्रमविनिमेय समूह (Additive Abelian Group), अर्थात एक ऐसा समूह, जिसमें योग की संक्रिया परिभाषित हो और यह संक्रिया क्रमविनिमेय हो, का उपसमुच्चय होता है | योज्य समुच्चय को आविष्ट करने वाले योज्य क्रमविनिमेय समूह को समावेशी समूह (Ambient Group) कहते हैं | उदाहरण के लिए, पूर्णांकों का समुच्चय $\mathbb{Z}$ एक योज्य क्रम विनिमेय समूह हैं और इनके उपसमुच्चय $\{1, 2, 3, 4\}$ और $\{p : p ~\text{एक अभाज्य संख्या है}~\}$ योज्य समुच्चय हैं | एक ही समावेशी समूह $G$ के दो या दो से अधिक योज्य समुच्चयों का योग - समुच्चय समूह $G$ के वैसे अवयवों का समुच्चय होता है, जिन्हें कुछ निश्चित प्रतिबंधों के अधीन योज्य समुच्चयों के अवयवों के योगफल के रूप में लिखा जा सकता है | उदाहरण के लिए, यदि $A_1, A_2, \ldots, A_h \subseteq G$ योज्य समुच्चय हों, तो इनका अप्रतिबंधित योग - समुच्चय (unrestricted sumset) $A_1 + A_2 + \cdots + A_h$ निम्न प्रकार परिभाषित किया जाता है:
\[A_1 + A_2 + \cdots + A_h := \{a_1 + a_2 + \cdots + a_h : a_i \in A_i ~\forall~ i\},\]
और इनका प्रतिबंधित योग - समुच्चय (restricted sumset) $A_1 \dotplus A_2 \dotplus \cdots \dotplus A_h$ निम्न प्रकार परिभाषित किया जाता है:
\[A_1 \dotplus A_2 \dotplus \cdots \dotplus A_h := \{a_1 + a_2 + \cdots + a_h : a_i \neq a_j ~\forall~ i \neq j\}.\]
किसी योज्य समुच्चय $A$ का $h$-प्रतीय योग - समुच्चय ($h$-fold sumset) निम्न प्रकार परिभाषित किया जाता है:
\[hA := \underbrace{A + \cdots + A}_{h-\text{प्रतियाँ}} = \{a_1 + \cdots + a_h : a_i \in A ~\forall~ i\}.\]
किसी योज्य समुच्चय $A$ का प्रतिबंधित $h$-प्रतीय योग - समुच्चय (restricted $h$-fold sumset) निम्न प्रकार परिभाषित किया जाता है:
\[h^{\hat{}}A := \underbrace{A \dotplus \cdots \dotplus A}_{h ~\text{प्रतियाँ}~} = \{a_1 + \cdots + a_h: a_i \in A ~\forall~ i ~\text{और}~ a_i \neq a_j ~\forall~i, j\}.\]
योज्य संख्या सिद्धांत के अंतर्गत हम प्रायः दो प्रकार की समस्याओं का अध्ययन करते हैं: 
  • प्रत्यक्ष समस्या (direct problem)
  • प्रतिलोम समस्या (inverse problem)
प्रत्यक्ष समस्या के अंतर्गत हम ज्ञात गुणधर्मों वाले योज्य समुच्चय (समुच्चयों) के योग समुच्चय की संरचना और इसके गुणधर्मों का अध्ययन करते हैं | गोल्डबाख अनुमान (Goldbach conjecture) इस समस्या का एक अत्यंत प्राचीन उदाहरण है | इस अनुमान के अनुसार, यदि $\mathbb{P}$ धनात्मक अभाज्य संख्याओं का समुच्चय हो, तो योग समुच्चय $2\mathbb{P}$ दो से बड़ी सभी सम संख्याओं को आविष्ट करता है, अर्थात $2\mathbb{P} = \mathbb{E}_{>2}$, जहाँ $\mathbb{E}_{>2}$ दो से बड़ी सभी सम संख्याओं का समुच्चय है| प्रत्यक्ष समस्या का एक प्रारूपिक कथन इस प्रकार दिया जा सकता है: यदि व्यष्टि योज्य समुच्चय (समुच्चयों) का गणनांक (cardinality) ज्ञात हों, तो इसके योग समुच्चय के गणनांक का निम्न परिबंध  व्यष्टि समुच्चय (समुच्चयों) के गणनांकों के पद में क्या होगा ? इस प्रकार की समस्या के कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमें कॉशी - डेवनपोर्ट प्रमेय (Cauchy - Davenport Theorem) और इर्दोस - हिल्ब्रोन अनुमान (Erdos - Heilbronn Conjecture)(वास्तव में यह अब एक प्रमेय है) महत्त्वपूर्ण हैं | 

कॉशी - डेवनपोर्ट प्रमेय : मान लीजिए $A$ और $B$ चक्रीय समूह $\mathbb{Z}_p$ के दो अरिक्त उपसमुच्चय हैं, जहाँ $p$ एक अभाज्य संख्या है | तब 
\[|A + B| \geq \min(p, |A| + |B| - 1).\]

कॉशी - डेवनपोर्ट प्रमेय सर्वप्रथम कॉशी [1] द्वारा 1813 में प्रमाणित किया गया था | डेवनपोर्ट [2] ने 1935 में इस प्रमेय की पुनर्खोज की थी और 1947 में उन्हें [3] इस सत्य की जानकारी हुई कि उनका यह प्रमेय कॉशी द्वारा 1813 में पहले ही खोजा जा चुका था | इसके बाद कई गणितज्ञों ने इस प्रमेय का कई दिशाओं में व्यापकीकरण किया है |

इर्दोस - हिल्ब्रोन अनुमान [4] : मान लीजिए $A$ चक्रीय समूह $\mathbb{Z}_p$ का अरिक्त उपसमुच्चय हैं, जहाँ $p$ एक अभाज्य संख्या है | तब
\[|2^{\hat{}}A| \geq \min(p, 2|A| - 3).\] 

यह अनुमान 1960 के आसपास इर्दोस और हिल्ब्रोन द्वारा प्रस्तुत किया गया था | डायस ड सिल्वा (Dias da Silva) और हैमिडून (Hamidoune) [5] ने 1994 में इस अनुमान की पूर्ण उपपत्ति दी थी | उन्होंने अधिक व्यापक रूप में निम्नलिखित प्रमेय की उपपत्ति दी थी :
मान लीजिए $A$ चक्रीय समूह $\mathbb{Z}_p$ का अरिक्त उपसमुच्चय है, जहाँ $p$ एक अभाज्य संख्या है | यदि $h$ कोई धनात्मक पूर्णांक हो, तो 
\[h^{\hat{}}A \geq \min(p, h|A| - h^2 + 1).\]
बाद में 1995 - 1996 में एलोन, नाथानसन और रूसा [6-7] ने इस प्रमेय की बहुपद - आधारित उपपत्ति दी थी |
पूर्णांकीय योग समुच्चय से संबंधित निम्नलिखित परिणाम [8] भी उल्लेखनीय है : यदि $A$ पूर्णांको का कोई अरिक्त उपसमुच्चय हो और $h$ कोई धनात्मक पूर्णांक हो, तो 
\[|hA| \geq h|A| - h + 1,\]
और
\[|h^{\hat{}}A| \geq h|A| - h^2 + 1.\]
प्रत्यक्ष समस्या के अंतर्गत एक और प्रारूपिक समस्या का कथन इस प्रकार है : यदि $A$ कोई ज्ञात संरचना वाला अरिक्त समुच्चय हो, तो इसके $h$-प्रतीय योग समुच्चय $hA$ और $h^{\hat{}}A$ की संरचना (structure) क्या होगी ? इस दिशा में नाथानसन (Nathanson) का निम्नलिखित मूलभूत प्रमेय [9] उल्लेखनीय है :
मान लीजिए $k \geq 2$ और $A = \{a_0, a_1, \ldots, a_{k-1}\}$ पूर्णांकों का एक अरिक्त समुच्चय है जिससे कि 
\[0 = a_0 < a_1 < \cdots < a_{k-1}\]
और
\[\gcd(a_1, \ldots, a_{k-1}) = 1.\]
तब पूर्णांकों $c$ और $d$ और समुच्चयों $C \subseteq [0, c-2]$ और $D \subseteq [0, d-2]$ का अस्तित्व होता है जिससे कि सभी $h \geq \max(1, (k-2)(a_{k-1}-1)a_{k-1})$ के लिए,
\[hA = C \cup [c, ha_{k-1}-d] \cup (ha_{k-1} - D).\]
प्रतिलोम समस्या के अंतर्गत हमें योज्य समुच्चय (समुच्चयों) के योग समुच्चय की संरचना और / या गुणधर्म ज्ञात होते हैं और हम उस (उन) योज्य समुच्चय (समुच्चयों) की संरचना और / या गुणधर्म ज्ञात करते हैं | इस प्रकार की समस्या का एक अत्यंत सरल उदाहरण अग्रलिखित है : गणनांक $k$ वाला पूर्णांकों कोई भी अरिक्त समुच्चय $A$, जिससे कि $|2A| = 2k-1$, एक समान्तर अनुक्रम होता है | कई गणितज्ञों, जैसे कि फ्रीमैन (Freiman), नेसर (Kneser), प्लनेक (Plunnecke), वोस्पर (Vosper), रूसा (Ruzsa), नोगा एलोन (Noga Alon), नाथानसन (Nathanson), सेमेरेडी (Szemeredi), भान भु (Van Vu), ग्रीन (Green), टेरेंस टाउ (Terence Tao), इत्यादि  ने इस समस्या पर महत्वपूर्ण कार्य किये हैं | प्रतिलोम समस्या के अंतर्गत एक प्रारूपिक समस्या का कथन इस प्रकार है: यदि योज्य समुच्चय $A$ का योग समुच्चय $2A$ का गणनांक $|2A|$ "लघु" हो, तो व्यष्टि समुच्चय $A$ की संरचना क्या होगी ? यदि यह समुच्चय पूर्णांकों का उपसमुच्चय हो, तो फ्रीमैन [10 - 11] इस समस्या का संतोषप्रद उत्तर देते हैं: $A$ एक बहु-विम समान्तर अनुक्रम (multi-dimensional arithmetic progression) का उपसमुच्चय होता है|

अत्यधिक जानकारी के लिए निम्नलिखित संदर्भ द्रष्टव्य हैं :
[1] A. L. Cauchy. Recherches sur les nombres. J. Ecole polytech.,9:99-116, 1813.
[2] H. Davenport. On the addition of residue classes. J. London Math. Soc.,10:30-32,1935.
[3] H. Davenport. A historical note. J. London Math. Soc., 22:100-101, 1947.
[4] P. Erdos. On the addition of residue classes (mod $p$). In Proceedings of the 1963 Number Theory Conferences at the University of Colorado, pages 16-17, Boulder, 1963. University of Colorado.
[5] J. A. Dias da Silva and Y. O. Hamidoune, Cyclic spaces for Grassmann derivatives and additive theory, Bull. London Math. Soc.,26: 140-146, 1994.
[6] N. Alon, M. B. Nathanson and, I. Z. Ruzsa, Adding distinct congruence classes modulo a prime, Am. Math. Monthly,102: 250-255, 1995.
[7] N. Alon, M. B. Nathanson and, I. Z. Ruzsa, The polynomial method and restricted sums of congruence classes, J. Number Theory, 56: 404-417, 1996.
[8] M.B. Nathanson, Additive Number Theory : Inverse Problems and the Geometry of Sumsets, Springer, 1996.
[9] M.B. Nathanson, Sums of finite sets of integers, Am. Math. Monthly, 79:1010-1012, 1972.
[10] Gregory A Freiman.On the addition of finite sets. I. Izv. Vysh. Zaved. Matematika, 13(6):202–213, 1959.
[11] G. A. Freiman. Foundations of a Structural Theory of Set Addition, Translated from the Russian, Translations of Mathematical Monographs, volume 37. American Mathematical Society, Providence, RI, 1973
[12] Terence Tao, Van Vu. Additive Combinatorics, Cambridge Studies in Mathematics 105, Cambridge University Press, 2006.
[13] D. Grynkiewicz. Structural Additive Theory, Springer, 2013.

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