परिचय


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त्रिकोणमिति का संक्षिप्त परिचय

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गणिताञ्जलि प्रतियोगिता 2016 में पुरस्कृत लेख
प्रकाशन-तिथि: 22 दिसंबर 2016
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लेखिका: नैना कुमारी
वर्ग - दशम
उच्च विद्यालय चैनपुर पड़री, सहरसा, बिहार
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त्रिकोणमिति शब्द तीन शब्दों - त्रि, कोण और मिति से बना है. त्रि का अर्थ है तीन और मिति का अर्थ होता है माप. इस प्रकार त्रिकोणमिति का अर्थ है - तीन कोणों का माप. अतः त्रिकोणमिति (Trigonometry) विषय से तात्पर्य है गणित की वह शाखा जिसमें त्रिभुज (triangle) के कोणों (angles) और भुजाओं (sides) के बीच अंतर्संबंधों का अध्ययन किया जाता है.

चित्र - 1: त्रिभुज और उसके अंग
किसी त्रिभुज के मुख्यतः $6$ अंग होते हैं - तीन भुजाएँ और तीन कोण.  चित्र - 1 के $\triangle ABC$ में $AB, BC, CA$ भुजाएँ हैं और $\angle ABC, \angle BCA, \angle CAB$ कोण हैं.

यदि किसी त्रिभुज का एक कोण समकोण (right angle) अर्थात $90^{\circ}$ हो, तो उसे समकोण त्रिभुज (right triangle) कहते हैं. चित्र - 2 में दो समकोण त्रिभुज - $\triangle ABC$ और $\triangle PQR$ दिखाएँ गए हैं. $\triangle ABC$ और $\triangle PQR$ में क्रमशः $\angle ABC$ और $\angle PQR$ समकोण हैं.

क्योंकि किसी त्रिभुज के तीनों कोणों का योग $180^{\circ}$ होता है, अतः इनके शेष दो कोण न्यून कोण (acute angles) होंगे. उदाहरण के लिए, समकोण $\triangle ABC$ में $\angle CAB = \alpha$ और समकोण $\triangle PQR$ में $\angle QRP = \beta$ न्यून कोण हैं. त्रिकोणमिति और ज्यामिति में समकोण त्रिभुज की भुजाओं को विशेष नाम दिया जाता है:

कर्ण (Hypotenuse): समकोण त्रिभुज में समकोण के सम्मुख भुजा (सामने की भुजा) को कर्ण कहा जाता है. उदाहरण के लिए, चित्र - 2 में $AC$ और $PR$ क्रमशः $\triangle ABC$ और $\triangle PQR$ के कर्ण हैं.

शेष दो भुजाओं के नाम विचाराधीन न्यून कोण के अनुसार दिया जाता है.

लम्ब (Perpendicular): समकोण त्रिभुज किसी न्यून कोण के सम्मुख भुजा को उस कोण के संगत उस त्रिभुज का लम्ब कहा जाता है. उदाहरण के लिए, $BC$ और $PQ$ क्रमशः $\triangle ABC$ और $\triangle PQR$ में क्रमशः $\angle CAB$ और $\angle QRP$ के संगत लम्ब हैं.

आधार (Base): समकोण त्रिभुज किसी न्यून कोण को बनाने वाली छोटी भुजा को उस कोण के संगत उस त्रिभुज का आधार कहा जाता है. उदाहरण के लिए, $AB$ और $QR$ क्रमशः $\triangle ABC$ और $\triangle PQR$ में क्रमशः $\angle CAB$ और $\angle QRP$ के संगत आधार हैं.

चित्र - 2: समकोण त्रिभुज और उसके अंग

समकोण त्रिभुज और उसके अंगों से परिचित होने के बाद हम इस स्थिति में आ गए हैं कि त्रिकोणमितीय अनुपातों को परिभाषित कर सकें. हम जानते हैं कि दो समरूप त्रिभुजों के संगत भुजाओं का अनुपात बराबर होता है. उदाहरण के लिए, चित्र- 3 में दो समरूप समकोण त्रिभुज $\triangle ABC$ और $\triangle A'B'C'$ दिखाए गए हैं.

चित्र - 3: समरूप समकोण त्रिभुज

समरूपता गुणधर्म के अनुसार,
\[\frac{BC}{AC} = \frac{B'C'}{A'C'}, ~ \frac{AB}{AC} = \frac{A'B'}{A'C'}, ~\frac{BC}{AB} = \frac{B'C'}{A'B'}.\]
इस प्रकार हम देखते हैं कि समरूप समकोण त्रिभुजों में किसी नियत कोण के संगत दोनों ही त्रिभुजों के लम्ब, आधार और कर्ण के बीच अनुपात समान बने रहते हैं. अर्थात ये अनुपात समकोण त्रिभुज की भुजाओं पर निर्भर नहीं करते हैं. यही कारण है कि इन अनुपातों को विशेष नाम दिए गए हैं. इन अनुपातों को हम चित्र - 3 में $\angle \alpha$ के संगत निम्न रूप में व्यक्त करते हैं:
\[\sin\alpha = \frac{\text{लम्ब}}{\text{कर्ण}}, ~ \cos\alpha = \frac{\text{आधार}}{\text{कर्ण}}, ~ \tan\alpha = \frac{\text{लम्ब}}{\text{आधार}}.\]

इन त्रिकोणमितीय अनुपातों के व्युत्क्रम को क्रमशः $\mathrm{cosec}~\alpha, ~ \sec\alpha$ और $\cot\alpha$ से व्यक्त किया जाता है. अर्थात
\[\mathrm{cosec}~\alpha = \frac{1}{\sin\alpha} =\frac{\text{कर्ण}}{\text{लम्ब}},~\sec\alpha = \frac{1}{\cos\alpha}= \frac{\text{कर्ण}}{\text{आधार}},~ \cot\alpha = \frac{1}{\tan\alpha}= \frac{\text{आधार}}{\text{लम्ब}}.\]

नीचे की सारणी में कुछ कोणों के लिए इन अनुपातों के मान दिए गए हैं. कोणों के कुछ विशिष्ट मानों के लिए इन अनुपातों में से कुछ अनुपातों के मान परिभाषित नहीं है. इस स्थिति में हम उस अनुपात के मान को $\infty$ से नीचे के सारणी में व्यक्त किया गया है.

चित्र - 4: त्रिकोणमितीय अनुपातों के मान

हम जानते हैं कि समकोण त्रिभुज में $\text{कर्ण}^2 = \text{लम्ब}^2 + \text{आधार}^2$ होता है. इस तत्समक का प्रयोग कर हम कई त्रिकोणमितीय तत्समकों को सिद्ध कर सकते हैं. जैसे
\begin{align}
\sin^2 \theta + \cos^2 \theta &= 1. \label{id1}\\
\sec^2\theta - \tan^2\theta &= 1.\label{id2}\\
 \mathrm{cosec}^2\theta - \cot^2\theta &= 1.\label{id3}
\end{align}
त्रिकोणमितीय अनुपातों की परिभाषा के अनुसार हम लिख सकते हैं कि
\[\sin^2 \theta + \cos^2 \theta = \left(\frac{\text{लंब}}{\text{कर्ण}}\right)^2 + \left(\frac{\text{आधार}}{\text{कर्ण}}\right)^2 = \frac{(\text{लंब})^2}{(\text{कर्ण})^2} + \frac{(\text{आधार})^2}{(\text{कर्ण})^2} = \frac{(\text{लंब})^2 + (\text{आधार})^2}{(\text{कर्ण})^2} = \frac{(\text{कर्ण})^2}{(\text{कर्ण})^2} = 1.\] 

इसी प्रकार हम अन्य तत्समकों को भी सिद्ध कर सकते हैं. उपरोक्त सूत्रों से स्पष्ट है कि यदि हमें किसी भी एक त्रिकोणमितीय अनुपात का मान ज्ञात रहे, तो हम अन्य अनुपातों के मान ज्ञात कर सकते हैं.

$90^{\circ}$ से अधिक मान के कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपात

क्योंकि किसी समकोण त्रिभुज के कोण समकोण या न्यूनकोण होते हैं, अतः समकोण त्रिभुज के माध्यम से $90^{\circ}$ के कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपात को परिभाषित नहीं किया जा सकता है. इसके लिए सर्वप्रथम कार्तीय समतल में मूल बिंदु पर केन्द्रित वृत्त के केंद्र पर बने कोण के लिए आधार, लम्ब और कर्ण को  परिभाषित करने की आवश्यकता है, जो समकोण त्रिभुज की स्थिति में आधार, लम्ब और कर्ण की परिभाषा से मेल खाता है. फिर पहले की तरह त्रिकोणमितीय अनुपातों को परिभाषित किया जाता है और इस तरह यह न्यून कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपातों का व्यापकीकरण है.

कार्तीय समतल में  $x$-अक्ष के समानांतर किसी रेखाखंड की लंबाई मूल बिंदु के दायीं ओर धनात्मक और बायीं ओर ऋणात्मक माना जाएगा. इसी प्रकार, $y$-अक्ष के समानांतर किसी रेखाखंड की लंबाई मूल बिंदु के ऊपर दिशा की ओर धनात्मक और नीचे की ओर ऋणात्मक माना जाएगा. केंद्र $O$ और त्रिज्या $OQ$ का एक वृत्त खींचते हैं. रेखाखंड $OQ$ को $x$-अक्ष पर मूल बिंदु के दायीं ओर नियत रखते हैं. इसे हम किसी कोण का आदि रेखाखंड कहेंगे. अब एक परिक्रामी रेखाखंड $OP$ लेते हैं और इसे हम वृत्त पर केंद्र के इर्द-गिर्द तबतक परिक्रमण करते हैं, जबतक की हमें दिए गए कोण के बराबर $\angle AOP$ प्राप्त नहीं हो जाता है. परिक्रामी रेखाखंड को हम उस कोण का कर्ण कहते हैं और इसकी लंबाई सदैव धनात्मक ली जाती है. उदाहरण के लिए, चित्र - 5 में $\angle AOP = \theta$ और $\angle AOP' = 90^{\circ} + \theta$ हैं. इसी प्रकार, चित्र - 6 में $\angle AOP' = 180^{\circ} + \theta$ है. यदि परिक्रामी रेखाखंड वामावर्त दिशा में परिक्रमण करता है, तो कोण का मान धनात्मक लिया जाता है और यदि दक्षिणावर्त दिशा में परिक्रमण करता है, तो कोण का मान ऋणात्मक लिया जाता है. हम परिक्रमण रेखाखंड के परिक्रमण बिंदु (वृत्त की परिधि पर रेखाखंड का अंत्य बिंदु) से $x$-अक्ष की लम्बवत दूरी को (अर्थात उस बिंदु के $y$-निर्देशांक को) उस कोण का लम्ब कहा जाता है और परिक्रमण रेखाखंड के परिक्रमण बिंदु से $y$-अक्ष की लम्बवत दूरी को (अर्थात उस बिंदु के $x$-निर्देशांक को) उस कोण का आधार कहा जाता है. उदाहरण के लिए, चित्र - 5 में $\angle AOP = \theta$ के लिए $PA, OA$ और $OP$ क्रमशः लम्ब, आधार और कर्ण हैं; $\angle AOP' = 90^{\circ} + \theta$ के लिए $P'A', OA'$ और $OP'$ क्रमशः लम्ब, आधार और कर्ण हैं.  इसी प्रकार, चित्र - 6 में $\angle AOP = \theta$ के लिए $PA, OA$ और $OP$ क्रमशः लम्ब, आधार और कर्ण हैं; $\angle AOP' = 180^{\circ} + \theta$ के लिए $P'A', OA'$ और $OP'$ क्रमशः लम्ब, आधार और कर्ण हैं.

चित्र - 5: $\sin(90^{\circ} + \theta)$ का मान ज्ञात करना
चित्र - 6: $\sin(180^{\circ} + \theta)$ का मान ज्ञात करना



















अब हम आसानी से $90^{\circ}$ से अधिक मान वाले कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपात ज्ञात कर सकते है. यहाँ हम $90^{\circ} + \theta$और $180^{\circ} + \theta$ के त्रिकोणमितीय अनुपात ज्ञात करेंगे. चित्र - 5 में $90^{\circ} + \theta$ के कोण के लिए हम लम्ब, आधार और कर्ण हम परिभाषित कर चुके हैं. इसके त्रिकोणमितीय अनुपातों के मान हम न्यून कोण $\theta$ के त्रिकोणमितीय अनुपातों के पद में व्यक्त करेंगे. चित्र - 5 में आसानी से सत्यापित कर सकते हैं कि $\triangle AOP$ और $\triangle A'P'O$ सर्वांगसम हैं. अतः सर्वांगता गुणधर्म के अनुसार,
\[|OA| = |P'A'|, |PA| = |OA'| ~\text{और}~|OP| = |P'O|.\]
ध्यान दें कि हम रेखाखंडों के केवल निरपेक्ष मान की तुलना कर रहे हैं. अब
\begin{align*}
&\sin(90^{\circ} + \theta) = \frac{P'A'}{OP'} = \frac{OA}{OP} = \cos\theta.\\
&\cos(90^{\circ} + \theta) = \frac{OA'}{OP'} = \frac{-PA}{OP} = -\sin\theta,
~\text{क्योंकि}~OP' = -PA.\\
&\tan(90^{\circ} + \theta) = \frac{P'A'}{OA'} = \frac{OA}{PA} = \cot\theta.
\end{align*}

इसी प्रकार $180^{\circ} + \theta$, जहाँ $\theta$ न्यून कोण है, के त्रिकोणमितीय अनुपातों का मान ज्ञात करने के लिए हम चित्र - 6 की तरह कोणों की ज्यामितीय रचना करते हैं. यहाँ भी हम देख सकते हैं कि $\triangle AOP$ और $\triangle A'OP'$ सर्वांगसम हैं. अतः सर्वांगता गुणधर्म के अनुसार,
\[|OA| = |OA'|, |PA| = |P'A'| ~\text{और}~|OP| = |OP'|.\]
अब
\begin{align*}
&\sin(180^{\circ} + \theta) = \frac{P'A'}{OP'} = \frac{-PA}{OP} = -\sin\theta.\\
&\cos(180^{\circ} + \theta) = \frac{OA'}{OP'} = \frac{-OA}{OP} = -\cos\theta.\\
&\tan(180^{\circ} + \theta) = \frac{P'A'}{OA'} = \frac{-PA}{-OA}= \frac{PA}{OA} = \tan\theta.
\end{align*}

इसी प्रकार हम किसी न्यून कोण $\theta$ के लिए, $90^{\circ} - \theta, 180^{\circ} - \theta, 270^{\circ} \pm \theta, 360^{\circ} - \theta$ इत्यादि का मान ज्ञात कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त त्रिकोणमिति में $360^{\circ}$ से अधिक के कोणों और ऋणात्मक कोणों की भी संकल्पना है, जिसपर यहाँ चर्चा नहीं की जाएगी, क्योंकि उन कोणों के त्रिकोणमितीय अनुपातों को भी ज्ञात करने के लिए मूलभूत प्रक्रिया यही है.

त्रिकोणमिति के कुछ अनुप्रयोग

त्रिकोणमिति गणित की सबसे व्यावहारिक शाखा है. इसका प्रयोग गणित के साथ-साथ भौतिक शास्त्र में भी किया जाता है. खगोल विद्या के विकास में त्रिकोणमिति का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है. अतीत में खगोलशास्त्री त्रिकोणमिति का प्रयोग पृथ्वी से सूर्य, तारे एवं ग्रहों की दूरियाँ ज्ञात करने के लिए करते थे. त्रिकोणमिति का प्रयोग भूगोल और नौचालन में भी किया जाता है. इसका प्रयोग मानचित्र बनाने और देशांतर और अक्षांश के सापेक्ष एक द्वीप की स्थिति ज्ञात करने में भी किया जाता है. त्रिकोणमितीय परिणामों ने विज्ञान की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

यहाँ हम एक व्यावहारिक उदाहरण की सहायता से इसका एक अनुप्रयोग समझेंगे. मान लीजिए एक नदी, जिसकी चौड़ाई हमें ज्ञात है, के एक किनारे पर एक व्यक्ति खड़ा है और दूसरे किनारे पर एक बड़ा वृक्ष खड़ा है. वह व्यक्ति नदी को बिना पार किए वृक्ष की ऊँचाई जानना चाहता है. इसके लिए वह एक पृष्ठ पर एक समकोण $\triangle ABC$ की रचना करता है, जहाँ बिंदु $A$ वृक्ष के शीर्ष को और बिंदु $B$ वृक्ष के भू-स्थिति को निरूपित करता है. इस प्रकार लंबवत भुजा $AB$ वृक्ष की ऊँचाई को निरूपित करता है. वह व्यक्ति बिंदु $C$ का चयन इस प्रकार करता है कि भुजा (आधार) $BC$ नदी की चौड़ाई को व्यक्त करता है ( चित्र - 7 देखें ).
चित्र - 7: वृक्ष की ऊँचाई ज्ञात करना

मान लीजिए कि $BC = b$ और $AB = h$. हम एक यंत्र की सहायता से  $\angle ACB = \theta$ ज्ञात कर सकते हैं. तब हम $\tan \theta$ का भी मान ज्ञात कर सकते हैं. अब त्रिकोणमिती के अनुसार,
\[\tan \theta = \frac{AB}{BC} = \frac{h}{b}.\]
इसलिए,
\[h = b \tan \theta.\]
इस तरह हमें वृक्ष की ऊँचाई ज्ञात हो जाती है.

कुछ रोचक ऐतिहासिक तथ्य

ज्ञात तथ्यों से पता चलता है कि त्रिकोणमिति का कुछ - कुछ ज्ञान मिस्र-वासियों और बेबीलोन-वासियों को था, परन्तु इसका व्यवस्थित अध्ययन (भिन्न रूप में) सर्वप्रथम हेलेनिस्टिक-काल में किया गया. यह काल मिस्र-गणित और बेबीलोन- गणित के साथ ग्रीक-गणित का संगम काल था. भारत में त्रिकोणमिति का प्रारंभिक और महत्त्वपूर्ण विकास चौथी - पाँचवीं शताब्दी में हुआ. इस समय "सूर्य सिद्धांत" ग्रंथ में त्रिकोणमिति का अध्ययन किया गया और बाद में आर्यभट ने अपने ग्रंथ "आर्यभटीय" में त्रिकोणमिति में महत्त्वपूर्ण कार्य किया. 

त्रिकोणमितीय शब्द "$\sin$" की उत्पत्ति मूल रूप से संस्कृत शब्द "ज्या" से हुई है जिसका उल्लेख सर्वप्रथम पाँचवीं शताब्दी लिखित ग्रंथ "सूर्य सिद्धांत" में मिलता है. "ज्या" शब्द संस्कृत शब्द "जीवा" का समानार्थी है. "जीवा" शब्द का अरबी में "जिबा (Jiba)" के रूप में अनुवाद किया गया और फिर इसका लैटिन में गलत अर्थ में "sinus" के रूप में अनुवाद किया गया. इसके बाद अंग्रेजी में इसका अनुवाद "sine" के रूप में किया गया, जो बाद में संक्षिप्त होकर "$\sin$" बन गया.

अंग्रेजी शब्द "$\cos$" और "$\tan$" क्रमशः "cosine" और "tangent" का संक्षिप्त रूप हैं, जिसका उद्गम बहुत बाद में हुआ था. "cosine" का प्रयोग पूरक कोण के "sine" के अभिकलन को ध्यान में रखकर किया गया. आर्यभट ने इसे "कोटिज्या" कहा. त्रिकोणमितीय अनुपात "$\cos$" के लिए "cosinus" शब्द का प्रयोग एडमंड गुंटर (Edmund Gunter) ने किया था. संक्षिप्त रूपों $\sin, \cos, \tan$ का पहला प्रकाशित प्रयोग 16वीं शताब्दी के फ्रांसिसी गणितज्ञ अलबर्ट गिरार्ड (Albert Girard) ने किया था.

ध्यातव्य: इस लेख में प्रयुक्त किसी भी चित्र के किसी भी प्रकार से प्रयोग की अनुमति नहीं है.

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8 टिप्‍पणियां :

  1. शानदार लेख,बधाई हो नैना कुमारी जी, आप ऐसे ही अपनी स्किल को बनाये रखें और आगे बढने के लिये अंग्रेजी पर एकाधिकार करना होगा और अच्छे विड्यालयों से शिक्षा लेने हेतु प्रवेश परीक्षा की तैयारी अभी से करनी होगी..आज की तारीख में गणित में बढने के लिये काफी स्कालरशिप हैं बीएससी में 3000रु से 5000रु माह तक और 20000रु अलग प्रति वर्ष और एम एस सी में 16000-18000रु तक फिर पीएचडी में भी इससे ऊपर है .....

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  2. नैना कुमारी जी को पुरस्कार के लिए बधाई। उत्कृष्ट लेख

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  3. बहुत ही सुन्दर एक दशवी की छात्रा द्वारा उत्तम लेख बधाई हो नैना कुमारी को

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. श्रीमान... गणित विषय के बारे में पहली बार इस प्रकार की वेबसाइट मैंने देखी है और यकीन मानिये दिल ख़ुशी से भर गया| मुझे भी गणित में बहुत रूचि है और आपका प्रयास वाकई सराहनीय है| धन्यवाद

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  6. Dil khus kardia ji aapne aapki mehenat mere kam aai isleye thanks ji

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