परिचय


गणितीय ब्लॉग "गणिताञ्जलि" पर आपका स्वागत है ! $\ast\ast\ast\ast\ast$ प्रस्तुत वेबपृष्ठ गणित के विविध विषयों पर सुरुचिपूर्ण व सुग्राह्य रचनाएँ हिंदी में सविस्तार प्रकाशित करता है.$\ast\ast\ast\ast\ast$ गणिताञ्जलि : शून्य $(0)$ से अनंत $(\infty)$ तक ! $\ast\ast\ast\ast\ast$ इस वेबपृष्ठ पर उपलब्ध लेख मौलिक व प्रामाणिक हैं.

नवीनतम प्रविष्टियाँ सीधे आपके ई-मेल इनबॉक्स में...नीचे अपना ई-मेल पता प्रविष्ट कर सत्यापित करें !

3. अभाज्य संख्याएँ (Prime Numbers)

3.1. परिचय
 
एक धन पूर्णांक $a$ को पूर्णांक $n$ का गुणनखंड (factor) कहते हैं, यदि $a$ पूर्णांक $n$ को विभाजित करता है. इस स्थिति में हम $n$ को $a$ और किसी अन्य पूर्णांक $b$ के गुणनफल के रूप में व्यक्त कर सकते हैं. अर्थात $n = ab$ और इस स्थिति में  $b$ भी $n$ का  एक गुणनखंड होता है.  उदाहरण के लिए, $30$ का एक गुणनखंड $2$ है. इसलिए हम $30 = 2 \cdot 15$ लिखते हैं. इस प्रकार हमने $30$ को दो पूर्णांकों $2$ और $15$ के गुणनफल के रूप में लिख सकते हैं. हम देख सकते हैं कि दोनों ही गुणनखंड $30$ से छोटे हैं. अब इसके एक गुणनखंड $15$ पर विचार कीजिये. हम आसानी से कह सकते हैं कि $15$ का एक गुणनखंड $3$ है और इसलिए $15 = 3 \cdot 5$ लिख सकते हैं. इस प्रकार हम $30$ का पुनः गुणनखंडन (factorization) कर सकते हैं. अर्थात हम $30 = 2 \cdot 3 \cdot 5$ लिख सकते हैं. पुनः हम देखते हैं कि $30$ का प्रत्येक गुणनखंड $30$ से छोटा है. क्या हम इन गुणनखंडों में से किसी गुणनखंड को पुनः छोटे गुणनखंडों के रूप में लिख सकते हैं ? हम $2$ को $1 \cdot 2$ के रूप में लिख सकते हैं. क्योंकि किसी संख्या को $1$ से गुणा करने पर गुणनफल के रूप में वही संख्या प्राप्त होती है, अतः हम ऐसे गुणनखंड पर विचार नहीं करेंगे. इस प्रकार हम देखते हैं $30$ का और अधिक गुणनखंडन नहीं किया जा सकता, जिससे कि प्रत्येक गुणनखंड $1$ से बड़ा और $30$ से छोटा हो.  इस प्रकार के गुणनखंडन को अभाज्य गुणनखंडन (prime factorization) कहते हैं और गुणनखंडन में सम्मिलित प्रत्येक गुणनखंड को अभाज्य गुणनखंड (prime factor) कहते हैं, क्योंकि इन गुणनखंडों का पुनः विभाजन संभव नहीं है. जिस धन पूर्णांक को $1$ या उस संख्या के अतरिक्त किसी अन्य धन पूर्णांकों के गुणनफल के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सके, उसे हम अभाज्य संख्या (prime number) कहते हैं. दूसरे शब्दों में हम इसे निम्न प्रकार परिभाषित करते हैं:

परिभाषा 3.1 (अभाज्य संख्या). एक धन पूर्णांक $p > 1$ को अभाज्य संख्या कहा जाता है, यदि इसके गुणनखंड केवल $1$ और $p$ हों. एक से बड़ी वैसी संख्या, जो अभाज्य नहीं है, उसे संयुक्त संख्या (composite number) कहा जाता है. $1$ न तो अभाज्य संख्या है और न ही संयुक्त संख्या.

उदाहरण के लिए $2, 3, 5, 7, 11, 13, 17, 19, 23, 29, 31, 37, 41, 43, 47, 53, 59, 61, 67, 71$ प्रथम बीस अभाज्य संख्याएँ हैं. इस प्रकार $30$ के गुणनखंडन $2 \cdot 3 \cdot 5$ में सभी गुणनखंड अभाज्य संख्याएँ हैं. क्या सभी धन पूर्णांकों का अभाज्य गुणनखंडन संभव है ? अपने अनुभव और अंतर्ज्ञान से हम जानते है कि ऐसा करना सदैव ही संभव है. वास्तव में,  ऐसा करना संभव है. इस तथ्य को हम अगले अनुभाग में एक प्रमेय के रूप में सिद्ध करेंगे. इस प्रमेय को "अंकगणित का मूलभूत प्रमेय" (Fundamental Theorem of Arithmetic) कहा जाता है. परन्तु उससे पहले, हम अभाज्य संख्याओं से संबधित कुछ गुणधर्मों का विवेचन करेंगे. इन गुणधर्मों का उपयोग उपरोक्त प्रमेय को सिद्ध करने में किया जायेगा.

हम जानते हैं कि अभाज्य संख्या $3$ धन पूर्णांक $30$ को विभाजित करता है. $30$ को दो संख्याओं के गुणनफल के रूप में कई प्रकार से लिखा जा सकता है:
\[2 \cdot 15 = 3 \cdot 10 = 5 \cdot 6.\]
हम देखते हैं कि $30$ के प्रत्येक गुणनखंडन में कोई न कोई गुणनखंड $3$ से विभाजित होता है : $2 \cdot 15$ में $3 \mid 15$, $3 \cdot 10$ में $3 \mid 3$ और $5 \cdot 6$ में $3 \mid 6$. यह कोई संयोग नहीं है. वास्तव में, यदि कोई अभाज्य संख्या दो संख्याओं के गुणनफल को विभाजित करता है, तो यह अभाज्य संख्या उस गुणनफल में प्रयुक्त गुणनखंडों में से कम से कम एक गुणनखंड को अवश्य विभाजित करता है. निम्नलिखित प्रमेयिका में इसी तथ्य को सिद्ध किया गया है.

प्रमेयिका 3.2. यदि $p$ एक अभाज्य संख्या हो और $p \mid ab$, तो $p \mid a$ या $p \mid b$.

उपपत्ति: 
यदि $p \mid a$, तो हमारा कथन सिद्ध हो जाता है. अन्यथा मान लीजिए कि $p \nmid a$. तब हम सिद्ध करेंगे कि $p \mid b$. ध्यान दें कि $\gcd(p, a) = 1$, क्योंकि अभाज्य संख्या $p$ के विभाजक केवल $1$ और $p$ हैं, और $p \nmid a$. अतः यूक्लिड - प्रमेयिका (अध्याय 2, प्रमेय 2.12 देखें) के अनुसार $p \mid b$. इस प्रकार हमारी उपपत्ति पूर्ण होती है.

उपरोक्त प्रमेयिका को दो से अधिक संख्याओं के गुणनफल के लिए भी सिद्ध किया जा सकता है.

प्रमेयिका 3.2. यदि $p$ एक अभाज्य संख्या हो और $p \mid a_1a_2\cdots a_n$, तो किसी $k$, $1 \leq k \leq n$ के लिए $p \mid a_k$.

उपपत्ति: 
हम $n$ पर आगमन सिद्धांत लागू करेंगे. यदि $n =1$, सिद्ध करने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता है. अब मान लीजिए कि हमारा कथन सभी $m, 2 \leq m < n$ के लिए सत्य है. यदि $p \mid a_n$, तो हमारा कथन सिद्ध हो जाता है. अन्यथा $a = a_1\cdots a_{n-1}$ और $b = a_n$ लिखिए. तब $p \mid ab$. इसलिए प्रमेयिका 3.1 के अनुसार $p \mid a$ या $p \mid b$. क्योंकि $p \nmid b$, अवश्य ही $p \mid a$, अर्थात $p \mid a_1\cdots a_{n-1}$. तब आगमन परिकल्पना के अनुसार किसी $k, 1 \leq k \leq n-1$ के लिए $p \mid a_k$. इस प्रकार हमारी उपपत्ति पूर्ण होती है.

उपप्रमेय 3.3. यदि $p, q_1, q_2, \ldots, q_n$ एक अभाज्य संख्याएँ हों और $p \mid q_1q_2\cdots q_n$, तो किसी $k$, $1 \leq k \leq n$ के लिए $p = q_k$.

उपपत्ति: 
उपप्रमेय 3.2 के अनुसार, किसी $k$ के लिए $p \mid a_k$. क्योंकि $q_k$ एक अभाज्य संख्या है, जिसके गुणनखंड केवल $1$ और $q_k$ हैं, और $p > 1$, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि $p = q_k$.

3.2. अंकगणित का मूलभूत प्रमेय (Fundamental Theorem of Arithmetic)

इस अनुभाग में हम अंकगणित का मूलभूत प्रमेय सिद्ध करेंगे | इस प्रमेय के अनुसार $1$ से बड़ा किसी भी  धन पूर्णांक को अभाज्य संख्याओं के गुणनफल के रूप में अद्वितीयतः व्यक्त किया जा सकता है, जहाँ गुणनफल में अभाज्य गुणनखंडों के क्रम को महत्त्व नहीं दिया जाता है | निम्नलिखित प्रमेय में इसी तथ्य को सिद्ध किया गया है |

प्रमेय 3.4 (अंकगणित का मूलभूत प्रमेय). प्रत्येक धन पूर्णांक $n > 1$ को अभाज्य संख्याओं के गुणनफल के रूप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:
\[n = p_1^{e_1} \cdots p_k^{e_k},\]
जहाँ $p_1, \ldots, p_k$ भिन्न - भिन्न अभाज्य संख्याएँ हैं और $e_1, \ldots, e_k$ धन पूर्णांक हैं | यदि इस निरूपण में अभाज्य गुणनखंडों के क्रम को महत्त्व न दिया जाये तो यह निरूपण अद्वितीय होता है |

उपपत्ति: 
सर्वप्रथम प्रबल आगमन सिद्धांत के अनुप्रयोग द्वारा हम $n$ के अभाज्य गुणनखंडन का अस्तित्व सिद्ध करेंगे. फिर उसकी अद्वितीयता सिद्ध करेंगे. यदि $n = 2$, तो $n = 2^1$ अभीष्ट गुणनखंडन है. अब मान लीजिए कि $n \geq 3$ और प्रत्येक पूर्णांक $m, 2 \leq m < n$ के अभाज्य गुणनखंडन का अस्तित्व है. यदि $n$ अभाज्य हो, तो $n = n^1$ अभीष्ट अभाज्य गुणनखंडन है. अन्यथा $n = ab$, जहाँ $2 \leq a < n$ और $2 \leq b < n$. आगमन परिकल्पना के अनुसार, $a$ और $b$ के अभाज्य गुणनखंडन का अस्तित्व है. अतः उन गुणनखंडों को $a$ और $b$ के स्थान पर प्रतिस्थापित करने पर हमें $n$ का अभाज्य गुणनखंडन प्राप्त होता है. अब गुणनखंडन में आए प्रत्येक अभाज्य संख्या के घातांकों को इकठ्ठा कर लिखने पर हमें $n$ का अभाज्य गुणनखंडन $n = p_1^{e_1} \cdots p_k^{e_k}$ के रूप में प्राप्त होता है. 
           अब हम अभाज्य गुणनखंडन की अद्वितीयता सिद्ध करते हैं. मान लीजिए
\[n = p_1^{e_1} \cdots p_k^{e_k} = q_1^{f_1} \cdots q_k^{f_{\ell}}\]$n$ के अभाज्य गुणनखंडन हैं, जहाँ सभी $e_i$ और $f_j$ धनात्मक हैं. पहले अभाज्य गुणनखंडन के अनुसार $p_1 \mid n$, अर्थात $p_1 \mid q_1^{f_1} \cdots q_k^{f_{\ell}}$. अतः उपप्रमेय 3.3 के अनुसार किसी $j$ के लिए $p_1 = q_j$. दुसरे अभाज्य गुणनखंडन में अभाज्यों के क्रम को बदल कर हम मान सकते हैं कि $p_1 = q_1$. अब दोनों गुणनखंडों से क्रमशः $p_1$ और $q_1$ को निरसित करने पर हमें
\[p_1^{e_1-1} \cdots p_k^{e_k} = q_1^{f_1-1} \cdots q_k^{f_{\ell}}\]प्राप्त होता है. इस प्रक्रिया को हम तब तक दुहराते रहते हैं, जब तक कि कम से कम एक गुणनखंड से अभाज्य समाप्त न हो जाए. यदि किसी गुणनखंडन में कुछ अभाज्य शेष रह जाते हैं, तो हमें अभाज्यों के गुणनफल के रूप में $1$ का गुणनखंडन प्राप्त होगा, जो असंभव है. अतः अंतिम चरण में दोनों ही गुणनखंडनों से अभाज्य समाप्त हो जाते हैं. इस प्रकार अवश्य ही $k = \ell$ और $p_i = q_i$ (आवश्यकतानुसार अभाज्यों के क्रम को बदलने पर) प्राप्त होना चाहिए. इस तरह हमारी उपपत्ति पूर्ण होती है.

3.3. इरेटोस्थिनीज़ की चलनी-विधि (The Sieve of Eratosthenes)

अभी तक हम अभाज्य संख्याओं और उनके कुछ गुणधर्मों से अच्छी तरह परिचित हो चुके हैं. यदि एक धन पूर्णांक दिया हुआ हो, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि दी गई संख्या अभाज्य है या नहीं. यह निर्णय करना सैद्धांतिक रूप से संभव है. मान लीजिए दी गई संख्या $n$ है. इस संख्या के तुच्छ गुणनखंड (trivial factors) $1$ और $n$ हैं. यदि हम $n$ कोई अतुच्छ गुणनखंड (nontrivial factor) $a$ ज्ञात कर सके, तो $a \mid n$, और इस प्रकार $n$ एक संयुक्त संख्या होगी. यदि कोई भी अतुच्छ गुणनखंड न हो, तो $n$ के केवल तुच्छ गुणनखंड $1$ और $n$ होंगे और $n$ एक अभाज्य संख्या होगी. इस प्रकार किसी धन पूर्णांक $n$ की अभाज्यता (primality) की जाँच करने के लिए हमें $n$ से छोटी सभी संख्याओं से $n$ की विभाज्यता (divisibility) की जाँच करनी होगी. छोटी संख्याओं के लिए यह विधि आसान है, परन्तु बड़ी संख्याओं के लिए यह विधि व्यावहारिक सिद्ध नहीं होती. परन्तु इस विधि को थोड़ा दक्ष बनाया जा सकता है. इस विधि के अनुसार, हमें किसी धन पूर्णांक $n$ की अभाज्यता की जाँच करने के लिए केवल $\sqrt{n}$ की संख्याओं से $n$ की विभाज्यता की जाँच करना पर्याप्त होता है. यह तथ्य इस प्रेक्षण पर आधारित है कि यदि धन पूर्णांक $n$ अभाज्य नहीं हो, तो इसका कम से कम एक अतुच्छ गुणनखंड $\sqrt{n}$ से कम या इसके बराबर होगा. इसे हम निम्नलिखित प्रमेय के द्वारा स्पष्ट करते हैं:

प्रमेय 3.5. एक धन पूर्णांक $n \geq 2$ संयुक्त संख्या होती है यदि और केवल यदि यह $1$ से बड़ी किसी अभाज्य संख्या $p \leq \sqrt{n}$ से विभाज्य हो.

उपपत्ति: 
यदि $n$ $1$ से बड़ी किसी धन पूर्णांक $k \leq \sqrt{n}$ से विभाज्य हो, तो अवश्य ही $n$ संयुक्त है. विलोमतः मान लीजिए कि $n$ संयुक्त धन पूर्णांक है. तब $n = ab$, जहाँ $1<a<n$ और $1<b<n$. यदि दोनों ही गुणनखंड $a$ और $b$ $\sqrt{n}$ से बड़े हों, तो $ab > \sqrt{n}\sqrt{n} = n$, जो इस तथ्य का विरोध करता है कि $n = ab$. अतः गुणनखंडों $a$ और $b$ में कम से कम एक गुणनखंड $\sqrt{n}$ से कम या इसके बराबर अवश्य होगा. इसलिए इसका एक अभाज्य गुणनखंड $p$ अवश्य ही $\sqrt{n}$ से कम या इसके बराबर होगा.


आइये, इसे एक उदाहरण की सहायता से समझें. मान लीजिए हमें $2017$ की अभाज्यता की जाँच करनी है. क्योंकि $44 < \sqrt{2017} < 45$,  इसलिए $44$ से छोटी सभी अभाज्य संख्याओं $2, 3, 5, 7, 11, 13, 17, 19, 23, 29, 31, 37, 41$ और $43$ से $2017$ की विभाज्यता की जाँच करना पर्याप्त है. हम आसानी से जाँच कर सकते हैं कि $2017$ उपरोक्त अभाज्य संख्याओं में से किसी भी संख्या से विभाज्य नहीं है. अतः $2017$ एक अभाज्य संख्या है. आइये, अब $2093$ की अभाज्यता की जाँच करें. क्योंकि $45 < \sqrt{2093} < 46$, इसलिए $45$ से छोटी सभी अभाज्य संख्याओं $2, 3, 5, 7, 11, 13, 17, 19, 23, 29, 31, 37, 41$ और $43$ से $2093$ की विभाज्यता की जाँच करना पर्याप्त है. हम देख सकते है कि यह $7$ से विभाज्य है, अर्थात $2093
 = 7 \cdot 299$. अतः $2093$ अभाज्य नहीं है.

उपरोक्त विधि में हमने देखा कि किसी धन पूर्णांक $n$ की अभाज्यता जाँच करने के लिए हमें $\sqrt{n}$ तक की अभाज्य संख्याओं से ही $n$ की विभाज्यता की जाँच करनी होती है. फिर भी बड़ी संख्याओं के लिए यह विधि व्यावहारिक सिद्ध नहीं होती, क्योंकि $n$ के बड़े मानों के लिए $\sqrt{n}$ का भी मान बड़ा होता है, और तब हमें बहुत अधिक अभाज्य संख्याओं से $n$ की विभाज्यता की जाँच करनी होती है. किसी धन पूर्णांक $n$ की विभाज्यता की जाँच करने के लिए अभी तक कोई आसान विधि नहीं खोजी जा सकी है. परन्तु इस विधि से अधिक दक्ष ढेर सारी विधियाँ हैं, जिनकी चर्चा हम अगले अध्यायों में उपयुक्त स्थानों पर करेंगे.

आइये अब हम इरेटोस्थिनीज़ की चलनी विधि पर चर्चा करें. यह विधि परिमित संख्या में लिए गए धन पूर्णांकों के समुच्चय से अभाज्य संख्याओं को छाँटने की विधि है. यह विधि उपरोक्त विधि पर ही आधारित है. मान लीजिए हमें $100$ तक की अभाज्य संख्याएँ ज्ञात करनी है | हम निम्नलिखित प्रक्रिया दुहराते हैं :

चरण 1. दस क्षैतिज पंक्तियों में $1$ से $100$ तक की संख्या लिखें.
चरण 2. $1$ को काट दें, क्योंकि यह अभाज्य संख्या नहीं है.
चरण 3. क्योंकि $2$ अभाज्य संख्या है, इस पर घेरा लगाएँ और $2$ के अतिरिक्त इसके अन्य सभी गुणजों $2, 4, 6, 8, 10, \ldots$,  इत्यादि को काट दें.
चरण 4. अब अगली अभाज्य संख्या $3$ को घेर दें और इनके अन्य गुणजों को काट दें.
चरण 5. अगली अभाज्य संख्या $5$ को घेर दें और इनके अन्य गुणजों को काट दें.
चरण 6. पुनः अगली अभाज्य संख्या $7$ को घेर दें और इनके अन्य गुणजों को काट दें.
चरण 7. यह प्रक्रिया तब तक दुहराते रहें, जबतक कि सभी अभाज्य संख्याओं पर घेरा न लग जाएँ.

इस चरण के बाद हम देखते हैं कि हमें निम्नलिखित सारणी प्राप्त होती है, जिसमें वृत्ताकार घेरा के अंदर की सभी संख्याएँ अभाज्य हैं.
इरेटोस्थिनीज़ की चलनी विधि

3.4. अभाज्य संख्याओं की अनंतता (Infinitude of Prime Numbers)

उपरोक्त सारणी के देखने से एक स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि सबसे बड़ी अभाज्य संख्या कौन है या इनकी संख्या अनंत है. इस प्रश्न का उत्तर यूक्लिड (Euclid) की पुस्तक संख्या - IX में देखा जा सकता है, जहाँ उन्होंने सिद्ध किया है कि अभाज्य संख्याओं की संख्या अनंत है. उनका तर्क मोटे तौर पर इस प्रकार है: यदि अभाज्यों की एक परिमित सूची दी हुई हो, तो हम एक अन्य अभाज्य संख्या ज्ञात कर सकते हैं, जो इस सूची में नहीं हैं. नीचे के प्रमेय में हम इस तथ्य की स्पष्ट उपपत्ति देते हैं.

प्रमेय 3.6 (यूक्लिड). अभाज्य संख्याओं की संख्या अनंत है.

उपपत्ति: 
मान लीजिए कि अभाज्य संख्याओं की संख्या परिमित है. इन अभाज्यों की सूची $p_1, p_2, \ldots , p_n$ बनाईये. अब एक धन पूर्णांक $m = p_1p_2\cdots p_n + 1$ परिभाषित कीजिये. क्योंकि $m > 1$, अंकगणित के मूलभूत प्रमेय के अनुसार, कम से कम एक अभाज्य $p$ धन पूर्णांक $m$ को अवश्य विभाजित करेगा. क्योंकि हमारे पास परिमित संख्या में अभाज्य संख्याएँ हैं, अतः $p$ इन्हीं अभाज्यों में से कोई एक अभाज्य होगा. परन्तु तब $p \mid p_1\cdots p_n$. क्योंकि $p \mid m$, इसलिए अवश्य ही $p \mid (m - p_1\cdots p_n)$, अर्थात $p \mid 1$, जो एक अंतर्विरोध है. अतः अभाज्य संख्याओं की संख्या परिमित नहीं हो सकती. इस प्रकार हमारी उपपत्ति पूर्ण होती है. 

3.5. अभाज्य संख्याओं का वितरण (The Distribution of Prime Numbers)

उपरोक्त प्रमेय में हमने देखा है कि अभाज्य संख्याओं की अनंत है. इरेटोस्थिनीज़ की चलनी विधि के अंतर्गत हमने $1$ से $100$ तक की अभाज्य संख्याओं को सूचीबद्ध करने की विधि पर चर्चा की थी. हमने यह अनुभव किया था कि यह एक जटिल और अधिक समय लेने वाली प्रक्रिया है. हमारे मन में तुरंत एक प्रश्न उठता है - क्या अभाज्य संख्या के लिए कोई सूत्र है ? इस प्रश्न का उत्तर है - नहीं. इरेटोस्थिनीज़ की चलनी विधि से प्राप्त सारणी को देखने से भी पता चलता है, अभाज्य संख्याएँ किसी निश्चित प्रतिरूप (pattern) में नहीं हैं.  अतः कोई सटीक सूत्र खोज पाना असंभव प्रतीत होता है. परन्तु कुछ सन्निकट (approximate) और उपगामी (asymptotic) सूत्र हैं, जिसकी सहायता से किसी भी $n$ के लिए $n$वीं अभाज्य संख्या का सन्निकट मान ज्ञात किया जा सकता है. साथ ही किसी दिए गए संख्या $x$ तक की अभाज्य संख्याओं की संख्या सन्निकटतः ज्ञात किया जा सकता है. इस विषय पर चर्चा हम किसी अन्य लेख में करेंगे. इस अनुभाग में अभाज्य संख्याओं के आमाप और उनके वितरण से संबंधित कुछ परिणामों पर चर्चा करेंगे. हम $n$वीं अभाज्य संख्या को $p_n$ से निरुपित करेंगे.  निम्नलिखित प्रमेय में $p_n$ का उपरि परिबंध दिया गया है.

प्रमेय 3.7. यदि $p_n$ $n$वीं अभाज्य संख्या हो, तो $p_n \leq 2^{2^{n-1}}$.

उपपत्ति: 
इस कथन को आगमन सिद्धांत द्वारा सिद्ध करते हैं. यदि $n =1$, तो हमारा कथन स्पष्टतः सत्य है. मान लीजिए कि हमारा कथन $k, 1 \leq k \leq n$ के लिए सत्य है. तब
\begin{aligned}
p_{n+1} &\leq p_1\cdots p_n + 1\\
&\leq 2 \cdot 2^2 \cdots 2^{2^{n-1}} + 1\\
& = 2^{1 + 2 + 2^2 + \cdots + 2^{n-1}} + 1 =2^{2^n -1}\\
&\leq 2^{2^n -1} + 2^{2^n -1} = 2^{2^n}.
\end{aligned}
अतः हमारा कथन $n +1$ के लिए भी सत्य है. अतः आगमन सिद्धांत के अनुसार, हमारा कथन सभी $n \geq 1$ के लिए सत्य हैं.

उपप्रमेय 3.8. किसी धन पूर्णांक $n$ के लिए, $2^{2^n}$ से छोटी कम से कम $n + 1$ अभाज्य संख्याएँ हैं.

उपपत्ति: 
उपरोक्त प्रमेय के अनुसार, $p_1, p_2, \ldots , p_{n+1}$ में सभी $2^{2^n}$ से छोटे हैं.

क्योंकि किसी भी विषम धन पूर्णांक को $4n + 1$ या $4n + 3$ के रूप में व्यक्त किया जा सकता है, इसलिए विषम अभाज्य संख्याएँ भी इन रूपों में व्यक्त किये जा सकते हैं. एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या $4n + 1$ के रूप में या $4n + 3$ के रूप में व्यक्त किये जा सकने वाले अभाज्य संख्याओं की संख्या अनंत है. इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" है | नीचे के प्रमेय में हम सिद्ध करेंगे कि $4n + 3$ के रूप में व्यक्त किये जा सकने वाले अभाज्य संख्याओं की संख्या अनंत है. परन्तु उससे पहले हम निम्नलिखित प्रमेयिका सिद्ध करेंगे.

प्रमेयिका 3.9. यदि दो या अधिक पूर्णांक $4n + 1$ के रूप के हों, तो उनका गुणनफल भी इसी रूप का होता है.

उपपत्ति: 
केवल $4n + 1$ के रूप वाले दो पूर्णांकों पर विचार करना पर्याप्त है. मान लीजिए $m_1 = 4m +1$ और $m_2 = 4n + 1$. तब $m_1m_2 = (4m + 1)(4n + 1) = 4(4mn + m + n) + 1$, जो अभीष्ट रूप में है.

अब हम निम्नलिखित प्रमेय की उपपत्ति देंगे.

प्रमेय 3.10. $4n + 3$ के रूप में व्यक्त किये जा सकने वाले अभाज्यों की संख्या अनंत हैं.

उपपत्ति: 
इस कथन को हम अंतर्विरोध द्वारा सिद्ध करेंगे. मान लीजिए कि $4n + 3$ के रूप में व्यक्त किये जा सकने वाले अभाज्य संख्याओं की संख्या परिमित हैं और ये अभाज्य $p_1, \ldots, p_k$ हैं. अब एक धनात्मक पूर्णांक 
\[m = 4p_1\cdots p_k - 1 = 4(p_1\cdots p_k - 1) + 3\]
परिभाषित कीजिए. ध्यान दीजिए कि $m \geq 3$. अतः $m$ किसी अभाज्य संख्या से विभाजित होगा. क्योंकि $m$ एक विषम संख्या है, अतः इसके सभी अभाज्य गुणनखंड विषम होंगे और ये सभी गुणनखंड या तो $4n + 1$ के रूप के होंगे या $4n + 3$ के रूप के होंगे. यदि सभी गुणनखंड $4n + 1$ के रूप के हों, तो प्रमेयिका 3.9 के अनुसार $m$ भी $4n + 1$ के रूप का होगा, जो सत्य नहीं है. अतः $m$ का कम से कम एक अभाज्य गुणनखंड $4n + 3$ के रूप का अवश्य होगा. क्योंकि हम यह मानकर चले थे कि $4n + 3$ के रूप में व्यक्त किये जा सकने वाले अभाज्य केवल $p_1,\ldots , p_k$ हैं, अतः $m$ का कम से कम एक अभाज्य गुणनखंड इन्हीं अभाज्यों में से कोई एक अभाज्य, मान लीजिए $p_1$, होगा. परन्तु तब क्योंकि $p_1 \mid 4p_1\cdots p_k$, इसलिए $p_1 \mid 4p_1\cdots p_k - m = 1$, जो एक अंतर्विरोध है. अतः ऐसे अभाज्यों की संख्या परिमित नहीं हो सकती. इस प्रकार हमारी उपपत्ति पूर्ण होती है.

उपरोक्त उपपत्ति की ही तरह इस तथ्य की उपपत्ति नहीं दी जा सकती है कि $4n + 1$ के रूप में व्यक्त किये जा सकने वाले अभाज्यों की संख्या अनंत हैं. इस कथन की उपपत्ति हम आगे के किसी अध्याय में देंगे. उपरोक्त दोनों कथन डिरिक्ले (Dirichlet) के निम्नलिखित प्रमेय की विशेष स्थिति है.

प्रमेय 3.11. यदि $a$ और $b$ असहभाज्य धन पूर्णांक हों, तो सामानांतर अनुक्रम
\[a, a+b, a+2b, a+3b, \ldots\]
अनंततः अनेक अभाज्य संख्याओं को आविष्ट करता है.

उपरोक्त प्रमेय के अनुसार, किन्हीं दो असहभाज्य धन पूर्णांकों $a$ और $b$ के लिए $a+nb$ के रूप में व्यक्त किये जा सकने वाले अभाज्य संख्याओं की संख्या अनंत होती हैं. इस प्रमेय की उपपत्ति यहाँ हम नहीं देंगे. इसकी उपपत्ति वैश्लेषिक संख्या सिद्धांत (Analytic Number Theory) के अंतर्गत किसी अध्याय में दी जाएगी.

राज कुमार राजहंस
शोधार्थी, गणित विभाग
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान पटना 
भारत
ई-मेल: ganitanjalii@gmail.com

कोई टिप्पणी नहीं :

एक टिप्पणी भेजें

शीर्ष पर जाएँ