परिचय


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बुधवार, 12 नवंबर 2014

ऋण संख्याएँ, पूर्णांक संख्याएँ और परिमेय संख्याएँ



संख्याओं की आधारशिला : भाग - 5  



अपने पिछले लेख प्राकृत संख्याएँ और भिन्न संख्याएँ  में हमने देखा की ये संख्याएँ गणित के अतिरिक्त सामान्य व्यावहारिक समस्याओं के समाधान के लिए प्रयुक्त होती हैं | परन्तु गणितीय उद्देश्यों की पूर्ति में ये संख्याएँ पर्याप्त सिद्ध नहीं होतीं | उदाहरण के लिए, प्राकृत संख्याएँ व्यवकलन की संक्रिया के सापेक्ष संवृत नहीं है, अर्थात हम सदैव ही दो संख्याओं का अंतर ज्ञात नहीं कर सकते | उदाहरण के लिए हम $7 - 5$ तो ज्ञात कर सकते हैं, परन्तु प्राकृत संख्याओं के समुच्चय में $5 - 7 $ का कोई समाधान नहीं है | इस समस्या के समाधान के लिए, प्रस्तुत लेख में हम ऋण संख्याओं, पूर्णांक संख्याओं और परिमेय संख्याओं की गणितीय संकल्पना प्रस्तुत करेंगे और दिखाएँगे कि इन संख्याओं की सहायता से उपरोक्त समस्याओं का समाधान किया जा सकता है |



            सामान्य जीवन में प्राकृत संख्याएँ (natural numbers) और भिन्न संख्याएँ (fractions) गिनती (counting) और साधारण अभिकलन के लिए पर्याप्त हैं, परन्तु गणितीय कार्यों में ये संख्याएँ अपर्याप्त सिद्ध होती हैं | यदि पाँच गेंदों के समूह में से तीन गेंद निकाल लिया जाए तो शेष दो गेंद बचेंगे | गणितीय भाषा में हम इसे इस प्रकार व्यक्त करते हैं: $5-3=2$. परन्तु यदि आपसे यह पूछा जाए कि पाँच गेंदों के समूह में से सात गेंद निकाल लिया जाए तो कितने गेंद बचेंगे, तो संभवतः आपका उत्तर होगा : ऐसा नहीं किया जा सकता | वास्तव में, व्यवहार में ऐसा नहीं किया जा सकता | परन्तु हमारा प्रश्न बिलकुल ही अर्थपूर्ण है और गणित में इस प्रश्न का समुचित उत्तर भी है | एक दूसरा उदाहरण लेते है : मान लीजिए आपने किसी व्यक्ति के पास पाँच रूपये जमा किया और कुछ दिनों के बाद आपने उसी व्यक्ति से सात रूपये वापस लिया | अब यदि आपसे पूछा जाये की उस व्यक्ति के पास आपके कितने रूपये शेष है, तो आपका उत्तर होगा: उस व्यक्ति का मेरे ऊपर दो रूपये कर्ज है | गणितीय भाषा में आप लिखना चाहेंगे : $5 ~रूपये - 7~ रूपये = कर्ज ~2 ~रूपये $ | इस स्थिति में आपके पास उत्तर है | आपने यह नहीं कहा कि ऐसा करना असंभव है | ध्यान दीजिये कि इससे पहले का प्रश्न भी ऐसा ही था, परन्तु उस स्थिति में हमारे पास उत्तर नहीं था | इसका यह कारण है कि "दो गेंद कर्ज" अर्थहीन प्रतीत होता है | परन्तु रूपये के आदान - प्रदान कि स्थिति में "कर्ज" अर्थपूर्ण प्रतीत होता है | परन्तु गणित में दोनों प्रश्नों का आसान उत्तर है : $5~गेंद - 7~गेंद = -2~गेंद$ और $5~रूपये - 7~रूपये = -2~रूपये$ | यह अंक $2$ के पीछे लगे चिह्न $``-"$ को "ऋण चिह्न (minus sign)" कहते है और $``-2"$ को "ऋण दो" पढ़ते हैं | पहली स्थिति में, $``-2~गेंद"$ लिखने का तात्पर्य यह है कि हम अधिकतम निकाले जा सकने वाले गेंदों की संख्या से $2$ गेंद ज्यादा निकालना चाहते हैं | दूसरी स्थिति में, $``-2~ रूपये"$ का तात्पर्य यह है कि हमने उस व्यक्ति के पास जमा किये गए रूपये से $2$ रूपये अधिक वापस ले लिया, जिन्हें हमें वापस करना होगा | 
                 आइये हम अभिकलन की इस प्रक्रिया को दूसरे दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करें | यदि हमें $5-3$ ज्ञात करने के लिए कहा जाए, तो हम वास्तव में करते क्या हैं ? हम एक ऐसी संख्या ज्ञात करना चाहते है जिसे $3$ में जोड़ने पर $5$ प्राप्त होता हो | अर्थात हम एक ऐसी संख्या $x$ ज्ञात करना चाहते है जिससे कि $3 + x = 5$. आप सत्यापित कर सकते हैं कि $x = 2$ इस समीकरण को संतुष्ट करता है | अतः हम लिखते हैं: $x = 5 -3 = 2$. अब हम इस दृष्टिकोण से व्यंजक $5- 7$ पर विचार करते हैं ? इस स्थिति में हम एक ऐसी संख्या $x$ ज्ञात करना चाहते हैं, जिससे कि $7 + x = 5$ हो | हम जानते हैं कि ऐसी कोई प्राकृत संख्या $x$ का अस्तित्व नहीं है, जिससे कि उपरोक्त समीकरण संतुष्ट हो जाए (कयों ? प्राकृत संख्याओं के अभिगृहीतों का प्रयोग कर इसे सिद्ध करें)| अतः इस स्थिति में समीकरण $7 + x = 5$ प्राकृत संख्याओं के समुच्चय में साधनीय (solvable) नहीं है | व्यापक रूप में, प्राकृत संख्याओं $a$ और $b$ के लिए यह आवश्यक नहीं है कि समीकरण $a + x = b$ साधनीय हो | ऐसी स्थिति केवल प्राकृत संख्याओं के लिए ही नहीं है : यदि $a$ और $b$ भिन्न संख्याएँ हों, तो भी यह आवश्यक नहीं है कि समीकरण $a + x = b $ साधनीय हो | उदाहरण के लिए, समीकरण $\frac{1}{2} + x = \frac{1}{1}$ साधनीय है | वस्तुतः $x = \frac{1}{2}$ इस समीकरण का हल है | परन्तु समीकरण $\frac{1}{1} + x = \frac{1}{2}$ साधनीय नहीं है | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राकृत संख्याएँ हमारे गणितीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपर्याप्त हैं | अतः हमें प्राकृत और भिन्न संख्याओं के अतिरिक्त अन्य संख्याओं की खोज करनी होगी, जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति कर सकें | इस प्रक्रिया में हम विधि अपनायेंगे, जैसा कि हमने भिन्न संख्याओं की संकल्पना विकसित करने में की थी (देखें भिन्न संख्याएँ ) | वस्तुतः हम पूर्णांक संख्याओं (integers), ऋण संख्याओं (negative numbers) और परिमेय संख्याओं (rational numbers) की संकल्पना प्रस्तुत करने जा रहे हैं |
                हम संख्याओं के एक ऐसे समुच्चय का सृजन करना चाहते हैं जिससे कि प्राकृत या भिन्न संख्याओं $a$ और $b$ के लिए समीकरण $a + x = b$ इस नए समुच्चय में सदैव साधनीय हो | स्पष्ट है कि इस समीकरण का हल संख्याओं $a$ और $b$ पर निर्भर करेगा | अतः हम इस समीकरण के हल को $b - a$ से निरुपित करेंगे | तब $a + (b-a) = b$. ध्यान दें कि $b - a$ केवल एक संकेत है, जिसे हमने एक नई संख्या के रूप में स्वीकार किया है | अब एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है : यदि किन्हीं विशेष $a$ और $b$ के लिए समीकरण $a + x = b $ का प्राकृत या भिन्न संख्याओं के समुच्चय में हल हों, तो क्या यह हल $b - a$ के बराबर होगा ? आगे की चर्चा में हम देखेंगे कि वास्तव में ऐसा ही है | वास्तव में हमारा नया संख्या-समुच्चय प्राकृत और भिन्न संख्याओं को आविष्ट करेगा |
               हम $b - a$ के रूप के सभी संकेतों का संग्रह लेते हैं | अब यदि $b - a$ और $d -c$ इस संग्रह के अवयव हों, तो हम किस प्रकार निर्धारित करेंगे कि अवयव समान है या नहीं ? अतः हमें इस संग्रह में दो अवयवों के बीच समता (equality) को परिभाषित करना होगा | ऐसा हम अंकगणितीय संक्रियाओं के नियमों को इस संग्रह के अवयवों के लिए मान्य (valid) मानते हुए करेंगे | सर्वप्रथम हम मान लेते हैं कि अंकगणितीय संक्रियाओं के नियम मान्य हैं और $b -a = d-c$. तब $b + c = a + (b -a) + c = a + (d - c) + c = a + d$. विलोमतः, यदि $b + c = a + d$, तो $a + (b - a) + c = b + c = a + d$, और इसीलिये $(b-a)+c = d$. अतः $c + (b - a) = d$. इस प्रकार, $b - a = d - c$. अतः हम निम्नलिखित परिभाषित करते हैं :
\[b - a = d - c ~\text{यदि और केवल यदि}~ b + c = a + d.\]
            अब हम $b - a$ और $d -c$ का योग किस तरह परिभाषित किया जाए, इस विषय पर चर्चा करेंगे | चूँकि साहचर्य नियम और क्रमविनिमेय नियम मान्य हैं, हम लिख सकते हैं कि 
\[(a + c) + ((b-a) + (d - c)) = (a + (b -a)) + (c + (d -c)).\]
अतः $b - a$ और $d-c$ की परिभाषा से उपरोक्त व्यंजक $b + d$ के बराबर है | इसलिए पुनः परिभाषा से,
\[(b-a)+ (d - c) = (b + d) - (a+ c).\]
इसी प्रकार हम सिद्ध कर सकते हैं कि 
\[(b - a)\cdot (d-c) = (a \cdot c + b \cdot d) - (b \cdot c + a \cdot d).\]
एक महत्त्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है: यदि $b - a = b' - a'$ और $d - c = d' - c'$, तो 
\[(b - a)+(d - c) = (b'- a') + (d -c) = (b -a) + (d' - c') = (b' - a')+(d' - c'),\]
और
\[(b - a)\cdot (d - c) = (b' - a')\cdot (d - c) = (b -a)\cdot (d' - c') = (b' -a')\cdot (d' - c').\]

तुल्यता वर्ग 

अब हम अवयव $b - a$ के बराबर अवयवों के समुच्चय को $\overline{b - a}$ से निरुपित करेंगे और इसे $b - a$ का तुल्यता वर्ग कहेंगे | अर्थात,
\[\overline{b - a} := \{d - c : b + c = a + d\}.\]
सभी तुल्यता वर्गों के समुच्चय को हम $S$ से निरुपित करेंगे | अब हम आसानी से $S$ पर योग और गुणन की संक्रिया निम्न प्रकार परिभाषित कर सकते हैं :
\[\overline{b-a} + \overline{d - c} := \overline{(b - a)+(d - c)},\]
और 
\[\overline{(b - a)}\cdot \overline{(d - c)} := \overline{(b - a)\cdot (d - c)}.\]
यह आसानी से सत्यापित किया जा सकता है कि ऊपर दी गई परिभाषाएँ सुपरिभाषित हैं | समुच्चय $S$ को परिमेय संख्याओं के तुल्यता वर्ग का समुच्चय कहते हैं | व्यवहार में हम तुल्यता वर्ग लिखने में उर्ध्व - रेखा का प्रयोग नहीं करते | अतः यदि $\overline{r} \in S$ को हम $r$ लिखते हैं और इस तरह के अवयवों के समुच्चय को हम परिमेय संख्याओं का समुच्चय कहते हैं, जिसे सामान्यतः $\mathbb{Q}$ से निरुपित किया जाता है | अर्थात,
\[\mathbb{Q}:= \{r : \overline{r} \in S\}.\]

पूर्णांको का समुच्चय 

समुच्चय $S$ के वैसे सभी अवयवों $\overline{b -a}$ का समुच्चय लीजिए, जहाँ $b$ और $a$ प्राकृत संख्याएँ हैं और इस समुच्चय को $I$ से निरुपित कीजिये | समुच्चय $I$ को पूर्णांक संख्याओं के तुल्यता वर्गों का समुच्चय कहते हैं | अब हम प्राकृत संख्याओं की सहायता से पूर्णांक संख्याओं का समुच्चय प्राप्त करेंगे | प्राकृत संख्याओं $1, 2, 3, 4, 5, \ldots,m,$ इत्यादि की पहचान हम निम्न तुल्यता वर्गों से करते हैं :
$1 \leftrightarrow \overline{(1 +1)-1}, 2 \leftrightarrow \overline{(2 + 1)-1}, 3 \leftrightarrow \overline{(3 +1)-1}, \ldots, m \leftrightarrow \overline{(m + 1)-1},$ इत्यादि | अब हम कुछ नई संख्याओं को परिभाषित करते हैं :
\[0 \leftrightarrow \overline{1 - 1}.\] 
संख्या $0$ को "शून्य" कहते हैं | पुनः 
\[-1 \leftrightarrow \overline{1- (1 + 1)}, -2 \leftrightarrow \overline{1 - (2 + 1)}, -3 \leftrightarrow \overline{1 - (3 + 1)}, \ldots, -m = \leftrightarrow \overline{1 - (m +1)},\] इत्यादि |
अब हम पूर्णांको के समुच्चय $\mathbb{Z}$ को निम्न प्रकार परिभाषित करते हैं :
\[\mathbb{Z} := \{\ldots, -m, \ldots, -3, -2, -1, 0 , 1, 2, 3, \ldots, n, \ldots\}.\]
हम प्राकृत संख्याओं को धन पूर्णांक (positive integers) और ऋण चिह्न ($-$) वाले संख्याओं को ऋण पूर्णांक (negative integers) कहते हैं | शून्य ($0$) न तो धन पूर्णांक है और न ही ऋण पूर्णांक | 
               अंत में आईये, अब हम $5 - 7$ का मान ज्ञात करते हैं | ध्यान दें कि $5 - 7 = 1 - 3$, क्योंकि $5 + 3 = 1 + 7$. अतः $5 - 7 = 1 -(2 + 1)$. इस प्रकार, $(5 -7) \in \overline{1 - (2 + 1)}$, जिसे हमने $-2$ से पहचान किया था | अतः $5 - 7 = -2$, जैसा कि हम प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ते हैं | इसी प्रकार $7 - 5 = 3 -1$, क्योंकि $7 + 1 = 3 + 5$. अतः $(7 - 5) \in \overline{3-1}$, अर्थात $7 -5 \in \overline{(2 + 1)-1}$, जिसे हमने $2$ से पहचान किया है | अतः $ 7 - 5 = 2$. 

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