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रविवार, 7 सितंबर 2014

अंकगणितीय संक्रियाएँ

संख्याओं की आधारशिला : भाग - ३  

अपने पिछले लेख प्राकृत संख्याएँ में हमने प्राकृत संख्याओं की अभिगृहीतीय आधारशिला रखी | वहाँ हमने योग और गुणन की संक्रियाएँ भी परिभाषित की | प्रस्तुत लेख में हम इन संक्रियाओं से संबंधित नियमों की चर्चा करेंगे | अंत में हम प्राकृत संख्याओं के निकाय की बीजगणितीय परिभाषा देंगे और इस परिभाषा से प्रेरित होकर हम अमूर्त बीजगणितीय निकाय को भी परिभाषित करेंगे | इस बीजीय निकाय की संकल्पना पूर्णांक संख्याओं की आधारशिला रखने में प्रयुक्त की जाएगी |


             यदि हम दो प्राकृत संख्याओं $2$ और $5$ का योग $2 + 5$ ज्ञात करें, तो हमें $7$ प्राप्त होता है | यदि हम इन संख्याओं का योग दुसरे क्रम में, अर्थात $5 + 2$ ज्ञात करें, तो हमें पुनः $7$ प्राप्त होता है | यह घटना कोई संयोग नहीं है | किन्हीं भी दो प्राकृत संख्याओं के लिए यह सत्य है | अर्थात, दो प्राकृत संख्याओं के योग में क्रम का कोई महत्त्व नहीं होता है | गणितीय संकेत में इसे हम निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं : किन्हीं दो प्राकृत संख्याओं $x$ और $y$ के लिए,  $x+y = y+x$  | इस नियम को योग का क्रमविनिमेय नियम  कहते हैं | 
             हमने दो प्राकृत संख्याओं का योग परिभाषित किया है (देखें  प्राकृत संख्याएँ ), परन्तु दो से अधिक प्राकृत संख्याओं का योग परिभाषित नहीं किया है | हमें प्रायः दो से अधिक प्राकृत संखाओं का योग ज्ञात करने की आवश्यकता होती है | उदाहरण के लिए, $2 + 5 + 8$ का मान क्या होगा ? परन्तु $2 + 5 + 8$ का अर्थ क्या है ? हमने $x+y$ तो परिभाषित किया है, परन्तु $x+y+z$ नहीं | निःसंदेह हम दो प्राकृत संख्याओं के योग की ही तरह तीन या अधिक प्राकृत संख्याओं का योग भी परिभाषित कर सकते हैं | परन्तु यह परिभाषा संभवतः जटिल होगी | अपने अनुभव के आधार पर हम निम्न प्रकार से भी योग ज्ञात कर सकते हैं | पहले हम $2+5$ ज्ञात करते हैं और तब प्राप्त योगफल में $8$ जोड़ते हैं | परन्तु हम पहले $5+8$ ज्ञात कर सकते थे और तब हम प्राप्त परिणाम का योग $2$ के साथ कर सकते थे | क्या ऐसा करने पर हमें अलग - अलग योगफल प्राप्त होता ? बिलकुल नहीं | गणितीय संकेत में, पहली प्रक्रिया में हमने $(2+5)+8$ का अभिकलन किया था और दूसरी प्रक्रिया में $2+(5+8)$ का | दोनों ही प्रक्रियाओं में हमें समान योगफल $15$ प्राप्त होता है | यह कोई संयोग नहीं है | वास्तव में किन्हीं भी तीन प्राकृत संख्याओं $x,y$ और $z$ के लिए $(x+y)+z = x+(y+z)$ सत्य होता है | इस नियम को योग का  साहचर्य  नियम  कहते हैं | अतः हमें व्यंजक $x+y+z$ को $(x+y)+z$ या $x+(y+z)$ से परिभाषित कर सकते हैं | इसी प्रकार तीन से अधिक प्राकृत संख्याओं का योग भी परिभाषित कर सकते हैं | दो से अधिक प्राकृत संख्याओं के गुणन  के लिए भी इसी तरह के नियम हैं | ये नियम निम्नवत हैं : 

सारणी - 1


योग
गुणन
क्रमविनिमेय नियम
$x + y = y + x$
$x.y = y.x$
साहचर्य नियम
$(x + y) + z = x + (y + z)$
$(x.y).z = x.(y.z)$
निरसन नियम
यदि $x + y = x + z$, तो $y = z$
यदि $x.y=x.z$ और $x \neq 0$, तो $y=z$
तत्समक $0$ और $1$
$0 + x = x$
$1.x = x$
बंटन नियम
$(x + y).z = x.z + y.z$

             इन नियमों को प्राकृत संख्याओं के अभिगृहितों की सहायता से प्रमाणित किया जा सकता है | ये सभी नियम अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनका प्रयोग अभिकलन के अतिरिक्त प्राकृत संख्याओं के अनेक गुणधर्मों को प्रमाणित करने में किया जा सकता है | इसके लिए हमें बार - बार प्राकृत संख्याओं के अभिगृहितों की सहायता लेने की आवश्यकता नहीं होती है | उदहारण के लिए, उपरोक्त नियमों की सहायता से हम तुरंत प्रमाणित कर सकते हैं कि $(x + y) + z = (z + y) + x$ | उपरोक्त नियमों की उपपत्ति हम किसी अन्य लेख में देंगे |
             याद कीजिये कि पूर्ण संख्या निकाय  संख्याओं $0, 1, 2, \ldots,$ इत्यादि का समुच्चय है, जिसमें दो द्विआधारी संक्रियाएँ योग  (+) और गुणन  (.) परिभाषित है | यह अभिगृहीतीय परिभाषा है |  हम पूर्ण संख्या निकाय को एक अन्य तरीके से भी परिभाषित कर सकते हैं : पूर्ण संख्या निकाय  संख्याओं $0, 1, 2, \ldots,$ इत्यादि का समुच्चय है, जो उपरोक्त सारणी में दिए गए अंकगणितीय संक्रियाओं के नियमों को  संतुष्ट करता है | इस परिभाषा से हमें एक अमूर्त बीजीय निकाय के संकल्पना की प्रेरणा मिलती है |
             बीजीय निकाय  एक अरिक्त समुच्चय है, जिसपर एक या अधिक द्विआधारी संक्रियाएँ परिभाषित होती है, जो कुछ नियमों को संतुष्ट करते हैं | उदहारण के लिए, योग और गुणन की संक्रियाओं सहित पूर्ण संख्याओं का समुच्चय एक बीजीय निकाय है | इस प्रकार यदि द्विआधारी संक्रियाओं द्वारा संतुष्ट किये जाने वाले नियमावलियाँ  अलग - अलग हों, तो हमें अलग - अलग बीजीय निकाय प्राप्त होंगे | उदाहरण के लिए, यदि हम योग की संक्रिया के साथ प्राकृत संख्याओं का समुच्चय साहचर्य नियम के साथ लें, तो हमें एक पूर्ण संख्याओं के बीजीय निकाय से अलग निकाय प्राप्त होगा | इस प्रकार के निकाय को अमूर्त बीजगणित में अर्ध -समूह  कहा जाता है | बीजीय निकाय अमूर्त होते हैं | इसके अवयव कुछ भी हो सकते हैं | बीजगणितज्ञ केवल द्विआधारी संक्रियाओं के सापेक्ष निकाय की संरचना में रूचि रखते हैं, न कि अवयवों के प्रकार पर | 
             एक बीजीय निकाय का सृजन आसानी से किया जा सकता है | हम कोई भी एक अरिक्त समुच्चय लेते हैं | अब इसके प्रत्येक अवयव - युग्म पर एक द्विअधारी संक्रिया को (गुणन सारणी में ) परिभाषित करते हैं | उदाहरण के लिए, हम समुच्चय $\{a, b, c\}$ लेते हैं और इसपर एक दिआधारी संक्रिया $*$ परिभाषित करते हैं, जिसे गुणन सारणी में प्रदर्शित किया गया है | इस सारणी में पंक्ति $x$ और स्तंभ $y$ के संगत अवयव $x * y$ निर्दिष्ट करता है | उदहारण के लिए, $a * b$ का मान $c$ है |

                                  सारणी - 2

$*$
$a$
$b$
$c$
$a$
$a$
$c$
$b$
$b$
$b$
$a$
$c$
$c$
$c$
$b$
$a$

             अब हम दो प्रकार के बीजीय निकायों को परिभाषित करेंगे : अर्ध - समूहज  और समूह | अर्ध  - समूहज  एक अरिक्त समुच्चय है, जिसपर केवल एक द्विआधारी संक्रिया $*$ परिभाषित होती है और जो निम्लिखित प्रतिबंधों को संतुष्ट करता है :
  • सभी $x$ और $y$ के लिए, $x*y = y*x$,
  • सभी $x, y$ और $z$ के लिए, $(x*y)*z = x*(y*z)$,
  • यदि $x*y=x*z$, तो $y=z$, और 
  • एक अवयव $e$ का अस्तित्व होता है जिससे कि $e*e=e$ |
             योग ($+$) की संक्रिया के सापेक्ष पूर्ण संख्याओं का समुच्चय एक अर्ध - समूहज है, जिसमें $e = 0$ चतुर्थ प्रतिबंध को संतुष्ट करता है | इसी प्रकार गुणन ($\cdot$) संक्रिया के सापेक्ष प्राकृत संख्याओं का समुच्चय एक अर्ध - समूहज है, जिसमें $e = 1$ चतुर्थ प्रतिबंध को संतुष्ट करता है | परन्तु गुणन ($\cdot$) संक्रिया के सापेक्ष पूर्ण संख्याओं का समुच्चय अर्ध - समूहज नहीं है, क्योंकि यह निकाय तृतीय प्रतिबंध को संतुष्ट नहीं करता है : $0 \cdot 1 = 0 \cdot 2$, परन्तु $1 \neq 2$ है |
             समूह  एक अरिक्त समुच्चय है, जिसपर केवल एक द्विआधारी संक्रिया $*$ परिभाषित होती है और जो उपरोक्त प्रतिबंधों में से द्वितीय और तृतीय प्रतिबंधों के अतिरिक्त एक और प्रतिबंध को संतुष्ट करता है :

  • किन्हीं दो अवयवों $a$ और $b$ के लिए एक अवयव $x$ का अस्तित्व होता है जिससे कि $a*x = b$ |
             जो समूह उपरोक्त प्रतिबंधों (अर्ध - समूहज के लिए प्रतिबंध) में प्रथम प्रतिबंध को भी संतुष्ट करता है, उसेक्रमविनिमेय समूह  कहते हैं | ऊपर दिए गए उदाहरणों में से कोई भी अर्ध समूहज समूह नहीं है | यदि हम पूर्ण संख्याओं के अर्ध - समूहज पर विचार करें तो हम पाते हैं कि यह समूह होने के लिए अंतिम प्रतिबंध को संतुष्ट नहीं करता है : ऐसे किसी अवयव $x$ का अस्तित्व नहीं होता है जिससे कि $1 + x = 0$ (क्यों ?) | क्या आप समूह का एक उदाहरण दे सकते हैं ? योग ($+$) संक्रिया के सापेक्ष पूर्णांको (इसे अभी हमने परिभाषित नहीं किया है) के समुच्चय के बारे में आपका क्या विचार है ? जब हम अपने किसी अन्य लेख में पूर्णांको को परिभाषित करेंगे, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह एक समूह है | 
             जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं कि बीजगणितज्ञ किसी बीजीय निकाय के बीजीय संरचना में रूचि रखते हैं, न कि अवयवों के प्रकार पर | इसका अर्थ यह है कि दो बीजीय निकाय तुल्य  कहे जाते हैं, यदि एक निकाय को दूसरे निकाय के अवयवों के बीच एकैक संगति स्थापित किया जा सके, जिससे कि निकाय की बीजीय संरचना परिरक्षित रहे | अर्थात, द्वितीय निकाय के अवयवों का व्यव्हार निकाय के बीजीय संक्रिया(ओं) के सापेक्ष  वही होता है, जो प्रथम निकाय के संगत अवयवों का व्यवहार इस निकाय के बीजीय संक्रिया(ओं) के सापेक्ष होता है | उदाहरण के लिए, यदि प्रथम निकाय के दो अवयव क्रमविनिमेय नियम को संतुष्ट करता है, तो इन अवयवों के संगत द्वितीय निकाय के अवयव भी क्रमविनिमेय नियम को संतुष्ट करेंगे | हम सारणी - 2 में दर्शाए गए बीजीय निकाय के तुल्य एक निकाय सारणी - 3 में  दे रहे हैं |

   
                                 सारणी - 3

$\circ$
$x$
$y$
$z$
$x$
$x$
$z$
$y$
$y$
$y$
$x$
$z$
$z$
$z$
$y$
$x$
             
यहाँ अंतर्निहित समुच्चय $\{x, y, z\}$ है और संगत द्विआधारी संक्रिया $\circ$ है | अवयवों के बीच एकैक संगति निम्न प्रकार है : $a \longleftrightarrow x $, $b \longleftrightarrow y $, और $c \longleftrightarrow z$ | यह संगति संगत द्विआधारी संक्रियाओं के सापेक्ष बीजीय संरचना को परिरक्षित रखता है | उदाहरण के लिए, प्रथम निकाय में $a*c = b$ और $b*c = c$ हैं और द्वितीय निकाय में क्रमशः $x \circ z = y$ और $y \circ z = z$ हैं | पुनः, प्रथम निकाय में $a*a = b*b$ है तो द्वितीय निकाय में भी संगत अवयवों के बीच इसी प्रकार का संबंध है : $x \circ x = y \circ y$ और इस तरह ये अवयव बीजीय संरचना को परिरक्षित रखते हैं | इस तरह हम देखते हैं कि यदि प्रथम बीजीय निकाय के अवयवों को संगत अवयवों से और $*$ को $\circ$ से प्रतिस्थापित करें, तो हमें समान बीजीय संरचना वाले निकाय प्राप्त होता है, जिसे सारणी - 3 में दिखाया गया है | अतः हम दोनों निकाय को भिन्न - भिन्न न मानकर समान ही मानते हैं और बीजगणितीय शब्दावली में इन्हें तुल्य निकाय कहते हैं | तुल्य निकायों की संकल्पना का बीजगणित में अत्यधिक महत्त्व है | इस विषय पर विस्तृत चर्चा हम बीजगणित के समूह - सिद्धांत पर अपने किसी अन्य लेख में करेंगे |


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