परिचय


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रविवार, 24 अगस्त 2014

प्राकृत संख्याएँ


संख्याओं की आधारशिला : भाग -२  
अपने पिछले लेख गणना में हमने गिनती की अवधारणाओं पर विस्तृत चर्चा की और इस क्रम में हम प्राकृत संख्याओं से भी परिचित हुए | परन्तु वहाँ हमने इन संख्याओं के अन्तर्निहित गुणधर्मों पर कोई चर्चा नहीं की | हमने केवल यह जाना कि ये संख्याएँ गिनती में प्रयुक्त होने वाले संकेत हैं जिनका एक सुनिश्चित क्रम है | परन्तु प्राकृत संख्याओं को परिभाषित करने के लिए इतनी बातें ही पर्याप्त नहीं हैं | प्रस्तुत लेख में हम इस विषय पर विस्तृत विश्लेषण करेंगे कि प्राकृत संख्याओं को किस तरह परिभाषित किया जा सकता है | हम इन संख्याओं के विशिष्ट गुणधर्मों का भी विस्तृत विश्लेषण करेंगे और सुपरचित योग और गुणन की संक्रियाओं को परिभाषित करेंगे |

यदि क और ख कोई दो प्राकृत संख्याएँ (natural numbers) हों, तो हम आसानी से सत्यापित कर सकते हैं कि क + ख = ख + क ‌| उदाहरण के लिए, यदि हम ५ और ३ का योग ५ + ३ अभिकलित करें, तो हमें ८ प्राप्त होगा | पुनः हम यदि ३ और ५ का योग अभिकलित करें, तो हमें ८ ही प्राप्त होगा | इस घटना को हम अन्य संख्या - युग्मों के लिए भी सत्यापित कर सकते हैं | यह कोई संयोग नहीं है, यह एक सर्वविदित तथ्य है | परन्तु हम इसे व्यापक रूप में कैसे सत्यापित करें | अर्थात, हम व्यापक कथन "क + ख = ख + क" को कैसे प्रमाणित करें | हम दो संख्याओं का योग तो ज्ञात कर सकते हैं, परन्तु दो बीजीय संकेतों से कैसे निपटें ! हम कह सकते हैं कि हम सभी संख्या - युग्मों के लिए इस कथन को बारी - बारी से सत्यापित करके इस कथन को सिद्ध कर सकते हैं | परन्तु क्या यह संभव हैं ? अपने पिछले लेख हमने स्पष्ट किया था कि प्राकृत संख्याएँ अनंत हैं | अतः इनके युग्मों की संख्या भी अनंत होगी (क्यों ?) | अतः हमारी यह योजना निष्फल सिद्ध हुई | यदि हम गहराई से सोचें, तो हमें यह कार्य अत्यंत कठिन प्रतीत होगा | इसे सिद्ध करना कठिन इसलिए नहीं है कि यह कथन क्लिष्ट है | अपितु इसे सिद्ध करना इसलिए कठिन है कि यह कथन अत्यंत सरल है | हम इस बात को नीचे स्पष्ट करते हैं | किसी भी गणितीय तथ्य को सिद्ध करने के लिए हम पहले से ज्ञात सरल तथ्यों का प्रयोग करते हैं | वे सरल तथ्य भी अन्य सरलतर तथ्यों की सहायता से सिद्ध किये गए होते हैं | अंततः हमें उन सरलतम तथ्यों पर पहुँचाना पड़ेगा, जिनसे अन्य तथ्यों की व्युत्पत्ति की जा सके | इन सरलतम तथ्यों को हम चाहकर भी सिद्ध नहीं कर पायेंगे | परन्तु ये तथ्य इतने सरल प्रतीत होते हैं कि हम अपने अंतर्ज्ञान से इसे सत्य मानते हैं | इन आधारभूत तथ्यों को अभिगृहीत (axioms) कहा जाता है |

अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्राकृत संख्याओं और उनकी अंकगणितीय संक्रियाओं की आधारशिला रखने हेतु हमें उन न्यूनतम तथ्यों को अभिगृहितों के रूप में सथपित करना होगा, जिनसे प्राकृत संख्याओं के सभी गुणधर्मों को व्युत्पन्न किया जा सके | अलग अलग व्यक्ति अलग - अलग अभिगृहितों के समूह प्रस्तावित कर सकते हैं | ऐसा संभव है | अतः अभिगृहितों के वैसे समूह ही स्वीकार किये जा सकते हैं, जिनसे प्राकृत संख्याओं के सभी गुणधर्मों को व्युत्पन्न किया जा सके और जिनकी संख्या न्यूनतम हों | अर्थात, प्रस्तावित समूह से एक भी अभिगृहीत हटाने पर सभी गुणधर्मों की व्युत्पत्ति संभव न हो सके |

अब प्रश्न उठता है कि हम इन अभिगृहितों को कैसे सुनिश्चित करें | इस कार्य हेतु हमें प्राकृत संख्याओं के गुणधर्मों से अवगत होना होगा | परन्तु इन गुणधर्मों को जानने के लिए यह जानना आवश्यक है कि प्राकृत संख्या वास्तव में है क्या | इस कार्य हेतु सर्वप्रथम हमें प्राकृत संख्याओं को विशुद्ध गणितीय रूप में परिभाषित करना होगा और फिर अंकगणितीय संक्रियाओं "योग" और "गुणन" को परिभाषित करना होगा | "व्यवकलन (अंतर)" और "भाजन" की संक्रियाएँ मौलिक संक्रियाएँ नहीं हैं | यह किसी अन्य लेख में स्पष्ट किया जाएगा |

अपने पिछले लेख गणना में हम प्राकृत संख्याओं से परिचित हो चुके हैं | हमने केवल यह जाना कि ये संख्याएँ गिनती में प्रयुक्त होने वाले संकेत हैं जिनका एक सुनिश्चित क्रम है | परन्तु प्राकृत संख्याओं को परिभाषित करने के लिए इतनी बातें ही पर्याप्त नहीं हैं | अन्य चीजों को भी एक निश्चित क्रम में रखा जा सकता है | उदाहरण के लिए, भिन्नों को आरोही (ascending) क्रम में रखा जा सकता है | परन्तु यह एक अन्य प्रकार का क्रम है, क्योंकि किन्हीं भी दो भिन्नों के बीच एक अन्य भिन्न को रखना संभव है | उदाहरण के लिए, भिन्नों के समूह $ \frac{१}{४}, \frac{१}{२}, \frac{२}{३}, \frac{४}{५} $ आरोही क्रम में हैं, परन्तु $ \frac{१}{४} $ और $ \frac{१}{२} $ के बीच हम $ \frac{१}{३} $ रख सकते हैं | वस्तुतः किसी भी भिन्न के तुरंत आगे आने वाले भिन्न नहीं होते हैं | अतः इस प्रकार का क्रम गणन के लिए उपयुक्त नहीं है | किसी निश्चित चरण तक गिनती के बाद हमें स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि आगे कौन सी संख्या आएगी | वास्तव में गिनती सीखने की प्रक्रिया यह सीखने की प्रक्रिया है कि कौन सी संख्या किस संख्या के बाद या पहले आती है | अतः हमें प्राकृत संख्याओं का एक आधारभूत गुण प्राप्त होता है : प्रत्येक प्राकृत संख्या के तुरंत बाद एक और केवल एक प्राकृत संख्या आता है | इस प्राकृत संख्या को हम पहली प्राकृत संख्या की "उत्तरवर्ती संख्या" (successor) कहते हैं और पहली संख्या को "अनुवर्ती संख्या" (predecessor) कहते हैं | (ध्यान दें कि किसी प्राकृत संख्या की उत्तरवर्ती संख्या मूल संख्या में १ योग करने पर प्राप्त हुई संख्या होती है, परन्तु हम इसे इस प्रकार परिभाषित नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अभी तक हमने योग के संक्रिया प्रभाषित नहीं की है |)

अब हम कह सकते हैं कि प्राकृत संख्याओं का क्या तात्पर्य है : प्राकृत संख्याएँ केवल और केवल अग्रोक्त संख्याओं का समुच्चय है - १, १ की उत्तरवर्ती संख्या, १ के उत्तरवर्ती संख्या की उत्तरवर्ती संख्या , इत्यादि | इससे यह तुरंत स्पष्ट होता है कि $ \frac{१}{२} $ एक प्राकृत संख्या नहीं है, क्योंकि १ से प्रारंभ करके हम उत्तरवर्ती संख्या के रूप में $ \frac{१}{२} $ पर नहीं पहुँच सकते हैं |

इन तथ्यों को निम्नांकित दो कथनों के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है :
(अ) १ एक प्राकृत संख्या है ; और यदि क एक प्राकृत संख्या हों, तो इसकी उत्तरवर्ती संख्या भी एक प्राकृत संख्या होगी |
(आ) यदि किन्हीं वस्तुओं के समुच्चय में १ हों और इसमें प्रत्येक संख्या की उत्तरवर्ती संख्या भी हों, तो इस समुच्चय में सभी प्राकृत संख्याएँ होंगीं |
कथन (अ) से तात्पर्य है कि १ की उत्तरवर्ती की उत्तरवर्ती की उत्तरवर्ती की उत्तरवर्ती .............. एक प्राकृत संख्या है | कथन (आ) सुनिश्चित करता है कि केवल और केवल यही प्राकृत संख्याएँ हैं |

प्राकृत संख्याओं के क्रम को ध्यान से देखने पर एक बात और उभरकर सामने आती है | इस क्रम में प्रत्येक संख्या एक - दूसरे से भिन्न है | यदि हम संख्याओं का क्रमित समुच्चय १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ३,........... लें, तो यह क्रम गिनती के लिए अव्यावहारिक होगा, क्योंकि इस क्रम में ३ से ७ तक की संख्याएँ बार - बार पुनरावृत होंगीं | यह समस्या इसलिए उत्पन्न हो रही है कि २ और ७ की उत्तरवर्ती संख्या सामान है | इस समस्या का समाधान निम्नलिखित अभिगृहीत के द्वारा किया जा सकता है :
दो भिन्न - भिन्न संख्याओं के भिन्न - भिन्न उत्तरवर्ती संख्याएँ होती हैं |

परन्तु क्या यह अभिगृहीत पर्याप्त है ? यह अभिगृहीत इस सम्भावना से इनकार नहीं करता कि प्राकृत संख्या १ की पुनरावृति हो सकती है | उदहारण के लिए, यदि हम अनुक्रम १, २, ३, ४, ५, १, २, ३,.......... पर विचार करें, तो हम पायेंगे कि यह अनुक्रम उपरोक्त अभिगृहीत को संतुष्ट तो करता है, परन्तु अनुक्रम की सभी संख्याएँ एक - दूसरे से भिन्न नहीं है | अतः हमें एक और अभिगृहीत की आवश्यकता है :

प्राकृत संख्या १ की कोई पूर्ववर्ती संख्या नहीं होती है |

अब हमारे पास पर्याप्त अभिगृहीत हैं, जिनसे हम प्राकृत संख्या के सभी अंकगणितीय गुणधर्मों को सथपित कर सकते हैं | इसका गणितीय रूप में सुव्यवस्थित अध्ययन किसी अन्य लेख में किया जायेगा |

आइये, अब हम योग और गुणन की अंकगणितीय संक्रियाओं को परिभाषित करें | सर्वप्रथम हम योग की संक्रिया पर विचार करते हैं | यदि हम २ और ३ का योग करना चाहें, तो हम वास्तव में क्या करते हैं ? हम २ के बाद से तीन बार गिनते है- तीन , चार , पांच, और हम २ और ३ का योग ५ लिखते हैं | यह कार्य हम निम्न प्रकार भी कर सकते हैं : २ की उत्तरवर्ती संख्या ज्ञात करें, यह ३ है | अब ३ की उत्तरवर्ती संख्या ज्ञात करें, यह ४ है और पुनः ४ की उत्तरवर्ती संख्या ज्ञात करें, यह ५ है और यही योगफल है | ध्यान दें कि २ और ३ का योग ज्ञात करने कि इस प्रक्रिया में हमने २ से प्रारंभ करके क्रमशः ३ बार उत्तरवर्ती संख्या ज्ञात किया था | यदि हम किसी प्राकृत संख्या क के उत्तरवर्ती संख्या को क ' से निरूपित करें, तो उपरोक्त प्रक्रिया को हम इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं : २' = ३, ३' = ४ और ४' = ५, अतः २ + ३ = ५ | अतः हम आगमन सिद्धांत की सहायता से योग (+) की संक्रिया को निम्न प्रकार परिभाषित कर सकते हैं :
(अ) सभी प्राकृत संख्याओं $क$ के लिए, $क + १ = क'$,
(आ) सभी प्राकृत संख्याओं $क$ और $ख$ के लिए, $क + ख' = (क + ख)"$ |

इस प्रकार किसी भी प्राकृत संख्या $क$ के लिए $क +१$ को $क'$ से परिभाषित करते हैं और (आ) का प्रयोग कने पर हम कह सकते हैं कि $क + २ = (क + १)' = क'' $, $क + ३ = (क + २)' = क'''$, $क + ४ = क''''$, इत्यादि |

गुणन की संक्रिया को भी इसी प्रकार परिभाषित किया जा सकता है | गुणन वास्तव में पुनरावृत योग की ही संक्रिया है | यदि हम ४ और ३ का गुणनफल ज्ञात करना चाहें, तो हम ४ का ३ बार योग करते हैं , अर्थात ४ + ४ + ४ अभिकलित करते हैं | यदि हम क और ख का गुणनफल ज्ञात कर चुके हों, तो क और ख + १ का गुणनफल ज्ञात करने के लिए हमें केवल क और ख के गुणनफल में क जोड़ना होता है | उदाहरण के लिए, $ ४ \times ३ = ४ + ४ + ४ = १२ $, और इसीलिए $ ४ \times ४ = ४ \times (३ + १) = १२ + ४ = १६ $ | अतः हम गुणन संक्रिया को निम्न प्रकार परिभाषित कर सकते हैं :
(अ) सभी प्राकृत संख्याओं $ क $ के लिए, $ क \times १ = क $,
(आ) सभी प्राकृत संखाओं $ क $ और $ ख $ के लिए, $ क \times ख' = क \times ख + क $ |

इन दो परिभाषाओं और अभिगृहितों की सहायता से हम प्राकृत संख्या के सिद्धांतों को पूरी तरह स्थापित कर सकते हैं | उदहारण के लिए, हम सिद्ध कर सकते हैं कि किन्हीं दो प्राकृत संख्याओं $ क $ और $ ख $ के लिए $ क + ख = ख + क $ सदैव सत्य होता है | इस विषय पर विस्तृत चर्चा हम अगले लेख में करेंगे |

1 टिप्पणी :

  1. भाषात्मक तौर से उत्कृष्ट। ध्रुवांकों के लिए प्रयुक्त देवनागरी अक्षर उचित लगे।

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