परिचय


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सोमवार, 28 जुलाई 2014

गणना या गिनती (Counting)

गणना

संख्याओं की आधारशिला : भाग -1

गणना या गिनती  (Counting) से हम क्या समझते हैं ? आइये, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करें.

अपने प्रत्येक दिन के जीवन में हमें कई बार यह जानने या बताने की आवश्यकता होती कि कोई वस्तु कितने मात्रा में उपलब्ध हैं या दो समूहों में से किस समूह में अधिक वस्तुएँ हैं. यदि हम यह जानना चाहें  कि किसी विद्यालय में कितने छात्र हैं तो हम क्या करते है ? वास्तव में हम छात्रों को गिनते हैं. यह प्रक्रिया "गणना" या "गणन प्रक्रिया" कहलाती है. परन्तु यह प्रक्रिया क्या आसान है ?
यदि आप गिनती जानते हैं तो आप यह आसानी से बता सकते हैं कि कोष्ठ [***] में तीन तारक चिह्न हैं जबकि कोष्ठ [*********] में नौ तारक हैं. इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए आप जो प्रक्रिया  करते हैं, वह गणन प्रक्रिया है. परन्तु यही प्रश्न अगर आप एक ऐसे बच्चे से करें जो आपकी बातों को समझ  सकते हैं और अपनी बातों को अच्छी तरह व्यक्त भी कर  सकते हैं, परन्तु जिसे गिनना नहीं आता हो, तो वह ‍तारकों की संख्या नहीं बता पाएगा. गणन के अतिरिक्त एक और प्रक्रिया है - "तुलना करना". आप ऊपर के कोष्ठकों को केवल देखकर ही बता सकते हैं कि दूसरे कोष्ठ में अधिक तारक हैं. आपने  इस निष्कर्ष  पर पहुँचने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई, वह गणन प्रक्रिया नहीं थी. यद्यपि गणना के  द्वारा भी इस निष्कर्ष पर पहुँचा  जा सकता था. इस बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आइये दो  और कोष्ठक [**********] और [***********] लेते हैं. इन दोनों कोष्ठकों को देखकर आप शीघ्र ही नहीं बता सकते हैं कि  किस कोष्ठक में अधिक तारक हैं. या तो अापको गिनती करनी होगी या आप को किसी और  प्रक्रिया की आवश्यकता होगी यदि हम एक ऐसे मानव - प्रजाति की  कल्पना करें जो केवल दस तक गिन  सकते हैं, तो वे पूर्व के दो कोष्ठकों की तुलना तो कर सकते हैं, परन्तु बाद के दो कोष्ठकों में वे अंतर नहीं कर पायेंगे. अतः गणना या तुलना करने की प्रक्रिया आसान नहीं है. इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट करने के लिए हम आपसे एक प्रश्न करते हैं - क्या आप गिनती किये बिना अंत के दो कोष्ठकों की तुलना कर सकते हैं ? यदि आपका उत्तर "हाँ"  है, तो आपने सम्भवतः  "सुमेलन" (matching) अर्थात मिलान करने की विधि का उपयोग किया होगा. आइये इस विधि पर विस्तार से  करें. मान लीजिये कि हम किसी कक्षा के विद्यार्थियों के लिए एक खेल प्रतियोगिता आयोजित करना चाहते हैं, जिसमें दो समूह हैं. प्रथम समूह छात्रों का है और द्वितीय समूह छात्राओं का है. प्रत्येक समूह में समान संख्या में प्रतिभागी होने चाहिए. हम इस बात का निर्णय कैसे करें कि छात्रों की संख्या अधिक है या छात्राओं की या दोनों की संख्याएँ समान हैं ? एक क्षण के लिए हम मान लेते हैं कि न तो हमें गिनती आती है और न ही विद्यार्थियों के समूह को देखकर ही बताया जा सकता है. इस स्थिति में हम  क्या करते हैं ? हम प्रत्येक छात्रा को छात्रों  के समूह से अपना सह - प्रतिभागी चुनने को कहते हैं. इस प्रक्रिया के फलस्वरूप छात्र - छात्राओं के युग्म (pairs) बनते हैं. इस प्रक्रिया के बाद अगर कोई छात्र शेष रह जाता है, तो हम कहते हैं कि छात्रों की संख्या अधिक है. यदि कोई छात्रा शेष रह जाये, तो हम  कहते हैं कि  छात्राओं की संख्या अधिक है. यदि कोई भी छात्र या छात्रा शेष न रहे, तो हम कहते हैं कि दोनों समान संख्या में हैं. यह प्रक्रिया अत्यंत ही आसान है और गणित में इसका बहुत महत्व है. इस प्रक्रिया को हम "सुमेलन प्रक्रिया" कहते हैं. अतः यदि दो परिमित समुच्चय दिए हों, तो सुमेलन प्रक्रिया से हम आसानी से दोनों समुच्चयों की तुलना कर सकते हैं. यदि सुमेलन के फलस्वरूप किसी भी समुच्चय का कोई अवयव शेष न रहे तो, इसे हम "पूर्ण सुमेलन" (complete matching) कहेंगे. यदि दो समुच्चयों के बीच पूर्ण सुमेलन संभव हों, तो इन्हें हम "तुल्य" समुच्चय (set) कहेंगे. यदि प्रथम समुच्चय का  पूर्ण सुमेलन द्वितीय समुच्चय के किसी उचित (proper) उपसमुच्चय से संभव हों, तो हम कहते हैं कि प्रथम समुच्चय में अवयवों की संख्या द्वितीय समुच्चय के अवयवों की संख्या से कम है. अतः गिनती किये बिना भी दो समूहों के बीच तुलना की जा सकती है. फिर गणन प्रक्रिया की क्या आवश्यकता है ? यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? वास्तव में गणन आवश्यक और महत्वपूर्ण है, परन्तु गणन की प्रक्रिया आसन नहीं है. इसे हम शीघ्र ही स्पष्ट करेंगे. बाद में देखेंगे कि गणन की एक सुव्यवस्थित विधि सुमेलन प्रक्रिया द्वारा संभव है.
     एक क्षण के लिए आप पुनः मान लीजिये कि आपको गिनती बिलकुल नहीं आती है. मान लीजिये कि दो भिन्न शहरों में एक - एक विद्यालय हैं. आपको यह पता लगाने का कार्य दिया जाता है कि किस विद्यालय में अधिक छात्र है. यदि आप पूर्व वर्णित सुमेलन विधि अपनाना चाहें, तो दोनों विद्यालयों के छात्रों का एक जगह होना आवश्यक है जिससे कि आप दोनों विद्यालय के छात्रों के बीच युग्म बना सकें. मान लीजिये कि छात्रों को स्थानांतरित करने की अनुमति आपको नहीं है. क्या इस स्थिति में आप गिनती किये बिना बता सकते हैं? आप कुछ समय इस पर चिंतन करें तो आपको गिनती के महत्तव का पता चल जायेगा. परन्तु आप कोई वैकल्पिक विधि अवश्य खोज सकते हैं. जरा अपने मस्तिष्क पर जोर डालिए और सोचिए. आइये हम बताते हैं. ध्यान रखिये की आपको गिनती नहीं आती है. आप पहले विद्यालय के छात्रों को कहिये कि वो आपको एक -एक समान आकर के कागज के टुकड़े दें. आप उन टुकड़ों को लेकर दूसरे विद्यालय में आ जाएँ. अब आप छात्रों को कहिए कि प्रत्येक छात्र एक - एक टुकड़े उठाकर अपने पास रखें. इस क्रम में यदि कोई टुकड़ा शेष रह जाये तो, आप कहते हैं कि दूसरे विद्यालय में अधिक छात्र हैं. यदि कोई छात्र टुकड़ा प्राप्त करने से वंचित रह जाए, तो आप कहते हैं कि पहले विद्यालय में अधिक छात्र हैं. यदि न तो टुकड़ा शेष रहे और न ही छात्र, तो आप कहते हैं कि दोनों विद्यालयों में समान संख्या में छात्र हैं. यदि आप ध्यान से सोचें तो आप पायेंगे कि आपने एक व्यापक सुमेलन प्रक्रिया का उपयोग किया है, जिसमें आपने तीन समूहों के बीच सुमेलन किया. दो समूह दो अलग - अलग विद्यालय के छात्रों का था और एक समूह कागज के टुकड़ों का था. यह प्रक्रिया उसी तरह की प्रक्रिया थी जब आप तीन छात्रों की लम्बाईयों की तुलना किसी पैमाने (scale) के प्रयोग के बिना करते हैं. परन्तु यदि आपने गिनती का प्रयोग किया होता, तो यह कार्य बहुत ही आसान होता.

    आइये अब हम गणन प्रक्रिया पर अपना ध्यान केन्द्रित करें. यदि आप गहराई से सोचें, तो आप पायेंगे कि यह एक प्रकार से सुमेलन प्रक्रिया ही है. इसे हम शीघ्र ही स्पष्ट करेंगे, परन्तु सर्वप्रथम हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि गिनती के क्रम में हम अवचेतन (unconcious) रूप से क्या करते हैं. यदि आपसे पूछा जाये कि कोष्ठ [क क क क क] में कितने "क" हैं तो आप आसानी से गिनकर बता सकते हैं. पुनः यदि आपसे यह पूछा जाए कि नीचे दिए गए चित्र-1   में कितने "क " हैं , तो थोड़ी देर सोचने के बाद पुनः आप आसानी से बता देंगे. 
                                                                        
चित्र - 1
अब क्या आप चित्र - 2 में वलयों की संख्या बता सकते हैं ? क्या आपने गिनते समय कुछ बातों पर ध्यान दिया ?

चित्र - 2
आपने  इस बात पर अवश्य ध्यान दिया होगा कि चित्र - 2 में गिनते समय आप वलयों को एक विशेष क्रम में रखते हुए गिनते हैं. चुँकि चित्र - 2 में वलय अनियमित क्रम में हैं, अतः आपको कुछ कठिनाई अवश्य हुई होगी. परन्तु चित्र - 1 में कुछ कम कठिनाई हुई होगी और पहले उदाहरण में आपको कोई कठिनाई नहीं हुई होगी. इसी प्रकार यदि आपसे किसी खेत में खड़े बहुसंख्य मेमने के झुण्ड ( चित्र - 3 ) में मेमनों  को गिनने कहा जाए, तो यह बहुत ही कठिन कार्य होगा. अतः यह स्पष्ट होता है कि यदि हम गिनती जान भी लें तो गणन प्रक्रिया कठिन हो सकती है और गणन प्रक्रिया में क्रम (order) का बहुत महत्तव होता है.
चित्र -3






        अब बिन्दुओं (points) के संग्रह  [.], [. .], [. . .], [. . . .], [ . . . . . ], ...... इत्यादि पर विचार करें. यदि कोई समुच्चय  बिन्दुओं के संग्रह [.] के तुल्य हों, तो हम कहते हैं कि उस समुच्चय में अवयवों की संख्या एक  है. यदि कोई समुच्चय बिन्दुओं के संग्रह [. .] के तुल्य हों, तो हम कहते हैं कि समुच्चय में अवयवों की संख्या दो  हैं. इसी प्रकार हम अवयवों की संख्या को तीन , चार , पाँच, .... इत्यादि परिभाषित करते हैं. इस प्रकार हमें गणन की एक व्यावहारिक विधि प्राप्त होती है. हम गणन प्रक्रिया में वस्तुओं के समुच्चय को संकेतों (symbols) से व्यक्त करते हैं और प्रत्येक संकेत को एक निश्चित क्रम में रखते हुए उन्हें अद्वितीय नाम से संबोधित करते हैं. ये नाम समुच्चय में अवयवों (elements) की संख्या को व्यक्त करते हैं.  एक बार हम इन संकेतों और इनके नामों  से सहमत हो जाएँ, तो फिर गणन प्रक्रिया आसान हो जाती है. यदि किन्हीं वस्तुओं का संग्रह दिया हुआ हो, तो हम उस संग्रह का सुमेलन उपरोक्त बिन्दुओं के संग्रह से करते हैं. यदि पूर्ण सुमेलन के उपरान्त तुल्य बिन्दुओं के संग्रह में " " बिन्दुएँ हों, तो हम कहेंगे कि संग्रह में "" वस्तुएँ हैं. यही प्रक्रिया आप तारकों की संख्या गिनने वाले उदाहरण पर लागू कर सकते हैं. आइये, अब हम बिन्दुओं के स्थान पर सुपरिचित अंकीय संकेत 1, 2, 3, 4, 5,..... इत्यादि का प्रयोग करते हैं. हम बिन्दुओं के संग्रह  [.], [. .], [. . .], [. . . .], [ . . . . . ], ...... इत्यादि को  क्रमशः अंकों के संग्रह  [1], [1, 2], [1, 2, 3] , [1, 2, 3, 4], [1, 2, 3, 4, 5], ....... इत्यादि से व्यक्त करते हैं. जब हम किन्हीं  वस्तुओं के समुच्चय का सुमेलन उपरोक्त संग्रहों  में से किसी एक संग्रह से करते हैं, तो हमें पूरे संग्रह को याद रखने की आवश्यकता नहीं होती है. उस संग्रह के अंतिम अंकीय संकेत (numeric symbol) को याद रखना ही पर्याप्त होता है. इस प्रकार कोई समुच्चय यदि [1] के तुल्य हों, तो हम कहते हैं कि समुच्चय में अवयवों की संख्या 1 है | यदि कोई समुच्चय [1, 2] के तुल्य हों, तो हम कहते हैं कि अवयवों की संख्या 2 हैं, और  यदि [1, 2, 3] के तुल्य हों, तो हम कहते हैं कि अवयवों की संख्या 3 है, इत्यादि - इत्यादि. अतः गणन की इस सुव्यस्थित विधि में हमें अंकीय संकेतों को एक निश्चित क्रम में याद रखना आवश्यक होता है. अतः गणन प्रक्रिया किसी समुच्चय के अवयवों की एकैक संगति (पूर्ण सुमेलन)  क्रमानुसार अंकीय संकेतों 1, 2, 3, ...आदि से करने की एक प्रक्रिया है.

      हमारे अंतर्ज्ञान (intution) से यह स्पष्ट है कि हमें गणना हेतु अंकीय संकेतों की एक अनंत व क्रमित अनुक्रम की आवश्यकता होगी, क्योंकि ब्रह्माण्ड में वस्तुओं की संख्या, हमारे विचार  या हमारे अंतर्मन की कल्पनाएँ  अनंत हैं. परन्तु अनंत संकेतों को याद रखना हमारे लिए असंभव हो सकता है, परन्तु यह अनिवार्य है. अतः हमें इन संकेतों के निर्माण, अभिव्यक्ति  व उनको याद रखने की एक तर्कसंगत व व्यवस्थित  विधि की आवश्यकता होती है. मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसी कई विधियाँ खोजी गयीं. उदाहरण के लिए चित्रलिपि के द्वारा वस्तुओं की संख्याओं का निरूपण (चित्र - 4  देखें), खड़ी रेखाओं द्वारा निरूपण , इत्यादि.


चित्र - 4

एक अन्य विधि रोमन पद्धति है जिसमें 1, 2, 3, 4, 5, 6, .......इत्यादि के लिए I, II, III, IV, V, VI..... इत्यादि लिखे जाते हैं, जो आज तक भी थोड़ी-बहुत प्रचलित है। परन्तु ये सभी विधियाँ अधिक व्यावहारिक सिद्ध नहीं हुई. सर्वप्रथम भारतीयों ने अंकीय संकेतों 0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8 , 9 की खोज की और इन दस संकेतों का प्रयोग करके अन्य संख्याओं के निरूपण की एक सरल व व्यवस्थित विधि की खोज की, जिन्हें "दाशमिक पद्धति "  या "दशमलव  पद्धति " (decimal system) कहा जाता है. यही आजकल प्रचलित एक सुपरिचित व सुविधाजनक विधि है. संख्याएँ 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, .........., इत्यादि को प्राकृत संख्याएँ कहते हैं, जिनसे हम सभी अत्यंत सुपरिचित हैं.  इन संख्याओं के साथ अभिकलन की प्रक्रिया, जिन्हें प्रारंभिक कक्षाओं में "अंकगणित " (arithmetic) में पढ़ाया जाता है, वस्तुतः संख्याओं के निरूपण की दशमलव पद्धति का अध्ययन है, न कि संख्याओं का. संख्याओं के निरूपण की विविध विधियों की उत्पत्ति और उनके इतिहास पर किसी अन्य लेख में विस्तृत चर्चा की जायेगी.

3 टिप्‍पणियां :

  1. अत्यन्त ही रोचक लेख है। लेख में चित्रों के पर्याप्त प्रयोग से यह अौर अधिक अच्छे से समझ में आया। कुछ बातें नयी मालुम हुई, जैसे गिनने की प्रक्रिया मे क्रम का महत्व। भारतियों द्वारा दी गयी दाशमिक पद्धति का महत्व भी सिद्ध हुआ। हिन्दी के तकनीकी भाषा के रुप मे स्थापित करने की लड़ाई मे हम आपके साथ है।

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    1. आपको यह लेख अच्छा लगा ......... इसके लिए आपको बहुत - बहुत धन्यवाद महेंद्र जी ! इस लेख का उद्देश्य "लड़ाई" नहीं, बल्कि हिंदी में उच्च स्तर के मौलिक गणितीय चिंतन को बढ़ावा देना है | लेख की उपयोगिता और गुणवत्ता में वृद्धि हेतु पाठकों के सुझाव व टिप्पणियाँ सहर्ष आमंत्रित हैं |

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